"खामोशी का अंतराल"
पंकज शर्माकुछ अभाव शब्दों की पकड़ में नहीं आते,
वे भीतर की सूक्ष्म दरारों में बसते हैं,
जहाँ अर्थ का प्रकाश पहुँचते-पहुँचते
अपना आकार स्वयं खो देता है।
मैं अपने ही वाक्यों के सम्मुख ठहरकर पूछता हूँ—
तुम इतने संकोची क्यों हो,
किस भय से थरथराती है तुम्हारी ध्वनि,
जब सत्य भीतर निर्वस्त्र उपस्थित है।
वे उत्तर नहीं देते,
उनकी चुप्पी में एक मौन असहमति है,
मानो प्रत्येक उच्चारण का प्रयास
स्वयं को ही संशय में डाल देता हो।
मेरे कथन और मेरे अस्तित्व के मध्य
एक अर्थ-शून्य अंतराल पसरा है,
जो बाहर से रिक्त प्रतीत होता है,
पर भीतर निरंतर प्रतिध्वनित रहता है।
मैंने अनेक बार चाहा
कि इन कमियों को भाषा का आश्रय दूँ,
पर शब्द आते ही
औपचारिकता का आवरण ओढ़ लेते हैं।
तभी अनुभव हुआ—
खामोशी कोई अनुपस्थिति नहीं,
वह एक सघन और जाग्रत उपस्थिति है,
जो बिना तर्क भी अपना पक्ष रखती है।
मैं अपने भीतर का श्रोता भी हूँ,
और प्रश्नों से घिरा वक्ता भी,
संवाद की स्थिर मेज़ पर
एक अदृश्य विरामचिह्न धड़कता रहता है।
लोक मेरी चुप्पी की तहों में झाँकता है,
जैसे वहाँ कोई उत्तर छिपा हो,
पर हर अनुभूति का उद्घोष आवश्यक नहीं,
कुछ अभाव बस जीते हैं—
निस्तब्ध अंतराल की परिधि में,
बिना घोषणा,
बिना किसी प्रमाण।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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