हौसलों की उड़ान
अरुण दिव्यांशभर लो तुम नभ रण में ,
हौसलों की ऊॅंची उड़ान ।
हौसला कभी कम नहीं ,
आने न पाए ये थकान ।।
भूलना न हैसियत निज ,
धरणी पे हैं तेरे मकान ।
नशा हो शीर्ष चढ़ने का ,
नशा नहीं हो मद्यपान ।।
कर्म नशा जीवन सॅंवारे ,
मद्यपान जीवन डूबाता ।
कर्मनशा लाता शिखर ,
मद्यपान नहीं है भाता ।।
मर जाना मिट जाना पर ,
उड़ान तू करना न कम ।
चढ़ते चढ़ते रुक जाएगा ,
गर हो जाएगा तू नम ।।
हौसला हो यह नम नहीं ,
उड़ान हो यह कम नहीं ।
तुम्हें कोई भी पछाड़ दे ,
दुश्मन में भी दम नहीं ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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