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होलाष्टक की सीख

होलाष्टक की सीख

सत्येन्द्र कुमार पाठक
दादा बोले सुन लो बच्चों, होली की इक बात,
आठ दिनों का समय विशेष, लाता अपनी सौगात।
अष्टमी से जो शुरू हुआ, 'होलाष्टक' कहलाए,
संयम और भक्ति का मार्ग, हमको यह दिखलाए।
दिव्यांशु-प्रियांशु पूछें, "दादा! डंडा क्यों गाड़ा?"
बुच्चन बोला, "सफाई कर दो, साफ रहे घर-वाड़ा।"
दादा बोले, "भक्त प्रह्लाद और होलिका का यह चिन्ह,**
**बुराई जलेगी आग में, आएँगे पावन दिन।"
शशांक और अंशिका ने पूछा, "क्यों शुभ काम हैं वर्जित?"
पापा बोले, "ग्रह उग्र हैं, मन होता है अचंभित।**
चंद्रमा, सूर्य और शनि-मंगल, सब डोल रहे हैं आज,
**सावधानी से कदम बढ़ाओ, सिद्ध हों सारे काज।"
मम्मी बोलीं, "बेटा! यह तो ऋतु-परिवर्तन की बेला,**
ताप बढ़ेगा, कीटाणु भागें, जब लगेगा आग का मेला।
सात्विक भोजन, ध्यान लगाकर, मन को शुद्ध बनाओ,
**बड़ों का आदर, प्रेम भाव से, जग को स्वर्ग बनाओ।"
आठ दिनों तक जपें नाम हम, 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय',
मन का संशय दूर भगाएँ, सुख-समृद्धि घर आए।
तपकर कुंदन जैसे चमकें, फिर खेलेंगे हम रंग,
बुराई की हो हार सदा, और जीत रहे सच के संग!





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