Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि

डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
दुर्गासप्तशती के अंतर्गत तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त का श्लोक है--
"प्रकृतिस्त्वं हि सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा ।।"
यहाँ उक्त 'महारात्रि ' का ही लौकिक प्रतिरूप 'महाशिवरात्रि ' है। यह सत्त्वगुण-प्रधान महाव्रत है ।अन्य दो कालरात्रि और मोहरात्रि क्रमशः तमोगुण-प्रधान एवं रजोगुण-प्रधान हैं,जो लौकिक रूप में क्रमशः दीपावली और कृष्णजन्माष्टमी के रूप में समाम्नात हैं।
महाशिवरात्रि सदाशिव के आराधन का महाव्रत है,जो फाल्गुन कृष्णचतुर्दशी को संपाद्य है। इस रात्रि को शास्त्र-विहित विधि-विशेषपूर्वक रात्रि-जागरण के साथ लिङ्गस्वरूप सदाशिव आराधनास्पद हैं।
आए दिन लोगों ने शिव-विवाह के रूप में इस महाव्रत को लोकोत्सवापन्न कर दिया है,जो मेरी समझ के परे है।
फाल्गुन कृष्णचतुर्दशी न तो सती (दाक्षायणी)के साथ और न ही पार्वती के साथ शिव-विवाह की तिथि शास्त्रोक्त है।शिवपुराण,रुद्रसंहिता अध्याय 18 में तथोक्त तिथि है--चैत्र शुक्लपक्ष त्रयोदशी,रविवार। अग्निपुराण,अध्याय 178 में पार्वती के साथ शिव-विवाह की तिथ चैत्र शुक्ल तृतीया उल्लिखित है।उस दिन तिलमिश्रित जल से स्नान कर पार्वती-सहित भगवान् शंकर की स्वर्णाभूषण एवं फल आदि से पूजा करनी चाहिए और अखण्ड रात्रि-जागरण।
कालिकापुराण,अध्याय 41 के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी तिथि गुरुवार के दिन जब चन्द्रमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र तथा सूर्य रोहिणी नक्षत्र में थे, तब शिव ने विधिपूर्वक पार्वती का पाणिग्रहण किया--
"माधवे मासि पञ्चम्यां सिते पक्षे गुरोर्दिने ।
चन्द्रे चोत्तरफाल्गुन्यां भरण्यादौ स्थिते रवौ।।
------
वैवाहिकेन विधिना गिरिपुत्रीं हरोऽग्रहीत्।।
(देखें,श्लोक 41से श्लोक 44 तक)
मानसपीयूष (बालकांड,खण्ड 2 ,पृ.316 )में भी शिव-पार्वती -विवाह की यही तिथि समर्थित है।
कहना न होगा, परममहिम महाशिवरात्रि-व्रत को जो रूप लोगों ने अधुना दे रखा है ,यह धर्म की अतिशय गर्हित विडम्बना है। अर्थ-लोलुप पंडों एवं मूढ पंडितों ने धर्म की घोर कदर्थना कर डाली है। धर्म का तमाशा बना दिया है।धर्म के अत्यंत हास्यास्पद ऐसे विद्रूप (caricature) की मैं भर्त्सना करता हूँ,क्यों कि बहुत गहरे अर्थ में मैं धर्मनिष्ठ व्यक्ति हूँ।
"स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां
ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया।
मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे
आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी।।"
(श्रीमद्भागवत,1/18/9 )
(विश्व का कल्याण हो,दुष्टों की बुद्धि शुद्ध हो,सब प्राणियों में सद्भावना हो,सभी एक-दूसरे का हित-चिन्तन करें,हमारा मन शुद्ध मार्ग में प्रवृत्त हो।हम सब की बुद्धि निष्काम भाव से भगवान् श्रीहरि में प्रवेश करे!) "ॐ नमः शिवाय "
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ