स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर: एक बहुआयामी राष्ट्रभक्त
सत्येन्द्र कुमार पाठक
विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) भारतीय इतिहास के आकाश में एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनके विचारों और कार्यों ने भारतीय राजनीति और समाज को गहरे तक प्रभावित किया। वे केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक प्रखर चिन्तक, समाजसुधारक, इतिहासकार, कवि, ओजस्वी वक्ता और दूरदर्शी राजनेता भी थे। उनके समर्थक उन्हें श्रद्धा से 'वीर सावरकर' के नाम से संबोधित करते हैं।सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भागुर ग्राम में हुआ था। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित थी। उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और बाद में कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। लंदन का 'इंडिया हाउस' उनके क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बना, जहाँ उन्होंने 'अभिनव भारत' संस्था के माध्यम से भारतीय छात्रों को संगठित किया।
सावरकर भारत के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केंद्र लंदन में रहकर उनके विरुद्ध सशक्त आंदोलन चलाया। उनके जीवन के कुछ प्रमुख क्रांतिकारी पड़ाव निम्नलिखित हैं:
1857 का इतिहास: उन्होंने 1857 के विद्रोह को 'सिपाही विद्रोह' के बजाय 'भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम' सिद्ध करते हुए एक कालजयी पुस्तक लिखी। यह विश्व की ऐसी पहली पुस्तक थी जिसे प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया था।दोहरे आजीवन कारावास की सजा: नासिक षडयंत्र केस के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया और अंग्रेजों ने उन्हें 50 वर्ष की कठोर कारावास (दो काले पानी की सजा) देकर अंडमान की सेल्यूलर जेल भेज दिया।
जेल में संघर्ष: जेल की अमानवीय यातनाओं के बीच भी सावरकर का मनोबल नहीं टूटा। उन्होंने जेल की दीवारों पर कंकड़ों से कविताएं लिखीं और हजारों पंक्तियाँ कंठस्थ कीं।
'हिन्दुत्व' और राजनीतिक दर्शनके सावरकर ने भारतीय राजनीति को 'हिन्दुत्व' की एक नई परिभाषा दी। उनके अनुसार, "जो व्यक्ति सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक फैली भारत भूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है।" उपयोगितावाद और तर्कवाद: सावरकर परंपराओं के अंधानुकरण के विरोधी थे। वे विज्ञाननिष्ठ थे और समाज को रूढ़ियों से मुक्त करना चाहते थे। अखंड भारत: वे भारत के विभाजन के कट्टर विरोधी थे। 15 अगस्त 1947 को स्वराज मिलने पर उन्होंने खुशी तो जताई, लेकिन खंडित भारत का उन्हें गहरा दुःख था।
सैन्यीकरण का आह्वान: उनका मानना था कि राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सीमाओं का निर्धारण कागजों से नहीं, बल्कि युवाओं के शौर्य और सैन्य शक्ति से होता है।सावरकर का समाज सुधार का पक्ष उनके राजनीतिक पक्ष जितना ही सशक्त था। उन्होंने हिन्दू समाज को कमजोर करने वाली 'सात बेड़ियों' को तोड़ने का आह्वान किया: अस्पृश्यता (स्पर्शबंदी): वे छुआछूत के घोर विरोधी थे। रत्नागिरी में उन्होंने 'पतितपावन मंदिर' बनवाया जहाँ समाज के सभी वर्गों का प्रवेश समान था। शुद्धि आंदोलन: उन्होंने धर्म परिवर्तन कर चुके हिन्दुओं की घर वापसी के लिए निरंतर प्रयास किए। जाति-भेद का अंत: उनका मानना था कि जब तक हिन्दू समाज जातिवाद में बंटा रहेगा, वह सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता। सावरकर एक सिद्धहस्त लेखक और कवि थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में हजारों पृष्ठों का मौलिक साहित 5 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद सावरकर को गिरफ्तार किया गया। उन पर हत्या के षडयंत्र में शामिल होने का आरोप लगा, लेकिन न्यायालय ने उन्हें पूर्णतः निर्दोष पाया और बाइज्जत बरी किया। उनके और गांधीजी के बीच वैचारिक मतभेद जरूर थे, लेकिन सावरकर के 'वीर' व्यक्तित्व के प्रशंसकों में गांधीजी भी शामिल थे।
सावरकर ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में 'प्रायोपवेशनम्' (स्वेच्छा से भोजन-जल त्याग कर मृत्यु का वरण करना) का निर्णय लिया। उनका मानना था कि जब जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाए और शरीर कार्य करने में असमर्थ हो, तो मृत्यु का स्वागत करना चाहिए। 26 फरवरी 1966 को बम्बई में उन्होंने अपने पार्थिव शरीर का त्याग कियावीर सावरकर एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र को 'हिन्दुत्व' की वैचारिक चेतना और 'अखंड भारत' का स्वप्न दिया। उनके त्याग, जेल की कठोर यातनाओं और समाज सुधार के कार्यों ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर है।
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