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प्रेम का कोमल स्पर्श

प्रेम का कोमल स्पर्श

प्रेम प्यार का स्पर्श कोमल ,
एक झटका सह नहीं पाए ।
लग जाए प्रेम में जो झटका ,
प्रेम में झट फफोले आए ।।
प्रेम प्यार होत बहुत कोमल ,
मधुर सरस गीत उसे भाए ।
विश्वास जगत में फले प्रेम ,
मेंहदी सा है रच बस जाए ।।
विश्वास में घात सहन नहीं ,
प्रेम देता उसको ठूकराए ।
प्रेम प्यार में पागल होकर ,
कलट कलट प्रेम मर जाए ।।
प्रेम का प्यार है विश्वास से ,
मधुरता निष्ठा उसका मित्र ।
मिल जाए सभ्यता संग तो ,
हृदा में सीधे उभरता चित्र ।।
हृदय में जब चित्र उभरता ,
मिल जाता दिल से दिल ।
दिल से दिल जब मिलता ,
प्रेम जाता अंतरीक्ष खिल ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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