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राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग - पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और स्वाभिमान की दिशा में शुरू करेगी संवेदनशील पहल

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग - पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और स्वाभिमान की दिशा में शुरू करेगी संवेदनशील पहल

दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |

पत्रकारिता केवल आजीविका का साधन नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है। जब सत्ता, व्यवस्था या समाज में कहीं भी अन्याय होता है, तो सबसे पहले जो आवाज उठती है, वह पत्रकार की होती है। दिन हो या रात, संकट हो या संघर्ष, पत्रकार हर परिस्थिति में सच के साथ खड़ा रहता है। लेकिन विडंबना यह है कि जो समाज को आईना दिखाता है, वही अक्सर स्वयं असुरक्षा, दबाव और उपेक्षा का शिकार होता है। ऐसे में राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग समय की मांग बनकर सामने आता है।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में पत्रकारों को कई स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कहीं शारीरिक हमले, कहीं मानसिक प्रताड़ना, तो कहीं आर्थिक अस्थिरता। ग्रामीण और छोटे शहरों में काम करने वाले पत्रकार विशेष रूप से जोखिम में रहते हैं। कई बार उन्हें बिना किसी संस्थागत सुरक्षा के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है। ऐसे में एक ऐसा मंच, जो केवल नाम का नहीं बल्कि व्यवहारिक रूप से पत्रकारों के साथ खड़ा हो, आज सबसे बड़ी आवश्यकता है।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश कुमार शर्मा ने प्रस्ताव दिया है जो संवेदनशील बिंदु है कि “राहत कोष की स्थापना” की जाय। उन्होंने कहा है कि यदि आयोग से जुड़े लगभग 5000 पदाधिकारी किसी भी संकटग्रस्त पत्रकार की सहायता के लिए मात्र ₹50 का योगदान करें, तो यह राशि सीधे ₹2,50,000 तक पहुंच जाती है। यह रकम भले ही व्यक्तिगत रूप से छोटी लगे, लेकिन सामूहिकता में यह एक बड़ी ताकत बन जाती है।

देखा जाए तो यह आर्थिक सहायता से कहीं अधिक एक भावनात्मक संबल है। इसका संदेश स्पष्ट है कि “आप अकेले नहीं हैं, पूरा आयोग आपके साथ है।” संकट के समय यही भरोसा किसी परिवार को टूटने से बचा सकता है।

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश कुमार शर्मा ने प्रस्ताव दिया है कि “स्थायी राहत कोष” के अंतर्गत प्रत्येक पदाधिकारी द्वारा कम से कम ₹100 का प्रारंभिक योगदान दिया जाए। यह कोष केवल आपातकालीन स्थितियों के लिए ही नहीं, बल्कि देशभर में आयोजित आयोग के कार्यक्रमों, प्रशिक्षण सत्रों और प्रदेश, मंडल या जिला स्तर पर संगठनात्मक जरूरतों के लिए भी उपयोगी होगा।

देखा जाए तो इससे संगठन की कार्यक्षमता बढ़ेगी और यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि आयोग केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर सक्रिय और जिम्मेदार संस्था है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार अपने पेशे में प्रतिदिन जोखिम उठाता है, चाहे वह अपराध रिपोर्टिंग हो, राजनीतिक भ्रष्टाचार का खुलासा हो या सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज। ऐसे में प्रत्येक पत्रकार के लिए न्यूनतम ₹10 लाख का बीमा अनिवार्य किया जाना एक दूरदर्शी कदम है।


देखा जाए तो यह बीमा केवल पत्रकार के लिए नहीं है, बल्कि उसके परिवार के लिए एक सुरक्षा कवच है। विपत्ति की घड़ी में यह भरोसा कि आयोग उनके साथ खड़ा है, पत्रकार को और अधिक निर्भीक बनाता है।


राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश कुमार शर्मा ने कहा है कि राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग से अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस, न्यायिक अधिकारी और समाज के प्रतिष्ठित लोग जुड़े हुए हैं। उनका अनुभव और संवेदनशीलता यदि इस प्रस्ताव के साथ जुड़ जाए, तो यह पहल राष्ट्रीय स्तर पर एक मिसाल बन सकती है। यह केवल आर्थिक योजना नहीं है, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व का दस्तावेज है।
यह प्रस्ताव किसी एक व्यक्ति या पद का नहीं है, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय की गरिमा से जुड़ा है। जब पत्रकार साथियों को सुरक्षा, सम्मान और स्वाभिमान देंगे, तभी वे बिना भय के राष्ट्रहित में कार्य कर सकेंगे। यह समय है कि पत्रकारों के लिए खड़े होने का संकल्प लिया जाए, संगठन के रूप में, परिवार के रूप में। —--------------
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