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ऐ तन मन धन

ऐ तन मन धन

अरुण दिव्यांश
ऐ मेरे प्यारे तन मन धन ,
तेरा सबसे प्यारा वतन ।
वतन हेतु है जीना मरना ,
तू ही राष्ट्रीय महारतन ।।
तू ही तो है सच्चा भारत ,
भारत हेतु तू महाभारत ।
तू भारतीय अजर अमर ,
न ब्रह्मा विष्णु बिसारत ।।
कल से जो आज हुआ ,
आज कल टल जाएगा ।
कर ले राष्ट्र सेवा भक्ति ,
जीवन सफल हो जाएगा ।।
भारत हेतु तो दुलार है ,
मित्रों हेतु तो तू प्यार है ।
विश्वबन्धुत्व कदमें तेरे ,
अरि हेतु तीक्ष्ण धार है ।।
तू जो करेगा मेरे हित में ,
हमें सब कुछ स्वीकार है ।
तू ही आराधक साधक ,
तू लाल मेरा शृंगार है ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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