"आत्मस्वीकृति — जीवन-संतोष की प्रथम शर्त"
पंकज शर्मा
मनुष्य का जीवन बाह्य स्वीकृतियों की भीड़ में प्रायः स्वयं से दूर हो जाता है। समाज, संबंध एवं उपलब्धियाँ तब तक अर्थवान प्रतीत होती हैं, जब तक वे भीतर किसी रिक्तता को ढँक रही हों। किंतु “जब तक मनुष्य को अपना ही अनुमोदन प्राप्त न हो, तब तक जीवन में उसे सच्चा संतोष नहीं मिल सकता”—यह वाक्य आत्मा के उस मौन सत्य की ओर संकेत करता है, जहाँ बाह्य प्रशंसा निरर्थक हो जाती है। आत्मस्वीकृति वह दीप है, जो अंतरात्मा के अंधकार को प्रकाशित करता है।
दार्शनिक दृष्टि से आत्मानुमोदन अहंकार नहीं, बल्कि आत्मबोध है। यह स्वीकार करना कि अपूर्णता के साथ भी मैं पूर्ण हूँ, साधना का उच्चतम सोपान है। आध्यात्मिक जीवन में यही भाव मनुष्य को स्थिर, निर्भय एवं करुणामय बनाता है। जो स्वयं से संतुष्ट है, वही संसार को भी सच्चे अर्थों में स्वीकार कर सकता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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