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नभचरों का संरक्षण: हमारी संस्कृति की विरासत

नभचरों का संरक्षण: हमारी संस्कृति की विरासत

सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रस्तावना: आकाश के प्रहरी हर साल 5 जनवरी को जब हम 'राष्ट्रीय पक्षी दिवस' मनाते हैं, तो यह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं होती, बल्कि यह उन स्वतंत्र पंखों को सलाम करने का दिन है जो हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के असली इंजीनियर हैं। पक्षी न केवल अपनी चहचहाहट से सुबह को जीवंत बनाते हैं, बल्कि वे जैव विविधता के सबसे महत्वपूर्ण कड़ी भी हैं। आज जब जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण ने उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, तब उनके प्राचीन गौरव और आधुनिक संकट को समझना अनिवार्य हो गया है। भारतीय इतिहास और संस्कृति में पक्षियों का स्थान हमेशा से सर्वोच्च रहा है। हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले ही यह समझ लिया था कि प्रकृति का संतुलन इन नभचरों के बिना संभव नहीं है।। वेदों में पक्षियों को 'द्विज' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'दो बार जन्म लेने वाला'। गरुड़ को भगवान विष्णु का वाहन, हंस को माता सरस्वती का आसन और मोर को कार्तिकेय का वाहन मानकर उन्हें पूजनीय बनाया गया। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं थी, बल्कि पक्षियों को मानवीय हिंसा से बचाने का एक मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक तरीका था।
: इतिहास गवाह है कि मगध साम्राज्य के मौर्य सम्राट अशोक ने अपने पांचवें स्तंभ लेख (243 ईसा पूर्व) में स्पष्ट रूप से 'शुक' (तोता), 'सारिका' (मैना) और 'राजहंस' जैसे पक्षियों की हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह संभवतः विश्व इतिहास में वन्यजीव संरक्षण का पहला कानूनी दस्तावेज था। साहित्यिक विरासत में संस्कृत साहित्य के महाकवि : कालिदास के 'मेघदूतम' से लेकर मध्यकालीन कवियों तक, पक्षी हमेशा प्रेम और प्रकृति के संदेशवाहक रहे हैं। प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में भी पक्षियों की उपस्थिति को मानसिक स्वास्थ्य के लिए सुखद बताया गया है। विज्ञान और संरक्षण का उदय जैसे-जैसे समय बदला, पक्षियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण श्रद्धा से निकलकर विज्ञान की ओर बढ़ा। आधुनिक भारत में पक्षी विज्ञानके क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। आधुनिक काल में पक्षी संरक्षण का जिक्र 'बर्डमैन ऑफ इंडिया' डॉ. सलीम अली के बिना अधूरा है। उन्होंने अपनी दूरबीन और डायरी के साथ भारत के दुर्गम इलाकों की यात्रा की और 'हैंडबुक ऑफ द बर्ड्स ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान' जैसे ग्रंथ लिखे। उनके प्रयासों ने ही साइलेंट वैली और भरतपुर जैसे अभयारण्यों को संरक्षण की श्रेणी में खड़ा किया।
राष्ट्रीय पहचान के लिए 1963 में 'मोर' को राष्ट्रीय पक्षी घोषित करना केवल उसकी सुंदरता का सम्मान नहीं था, बल्कि यह भारत की उस समृद्ध वन्यजीव विरासत को बचाने का एक औपचारिक संकल्प था, जो लुप्त होने की कगार पर थीपक्षी हमारे पर्यावरण के लिए मुफ्त में वे सेवाएं प्रदान करते हैं, जिनके बिना मानव जीवन संकट में पड़ सकता है:
कीट नियंत्रण:में यदि पक्षी न हों, तो टिड्डियों और कीटों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि दुनिया की समस्त फसलें कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाएंगी। वनस्पति जगत के विस्तार में पक्षियों का सबसे बड़ा योगदान है। वे फल खाते हैं और उनके मल के माध्यम से बीज दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचते हैं, जहाँ नए जंगल उगते हैं। सफाई कर्मचारी की तरह गिद्ध जैसे पक्षी मृत जानवरों के अवशेषों को खाकर महामारियों को फैलने से रोकते हैं। गिद्धों की संख्या कम होने से समाज में रेबीज और एंथ्रेक्स जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा है। कंक्रीट के जंगल और अदृश्य तरंगें विगत कुछ दशकों में पक्षियों की संख्या में चिंताजनक गिरावट आई है। 'स्टेट ऑफ इंडियाज बर्ड्स' की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत में लगभग 50% पक्षी प्रजातियों की संख्या घटी है।।शहरीकरण और आवास का विनाश ने ऊँची इमारतें तो बना लीं, लेकिन उन झरोखों और मुंडेरों को खत्म कर दिया जहाँ गौरैया (Sparrow) अपने घोंसले बनाती थी। जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग ने उनके भोजन (कीटों) को भी जहरीला बना दिया है प्रौद्योगिकी का दुष्प्रभाव: मोबाइल टावरों से निकलने वाला इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन और आसमान में उड़ते पतंगों के घातक मांझे (चाइनीज मांझा) हर साल हजारों पक्षियों की जान ले लेते हैं। प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन में : बढ़ते तापमान के कारण प्रवासी पक्षियों (Migratory Birds) का रास्ता भटकना और समय से पहले प्रवास करना उनकी प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रहा है। राष्ट्रीय पक्षी दिवस का वैश्विक और स्थानीय महत्व में 5 जनवरी को मनाया जाने वाला यह दिवस 'एवियन वेलफेयर कोएलिशन' के प्रयासों से शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य पिंजरों में बंद पक्षियों के व्यापार को रोकना है। भारत में यह दिन हमें याद दिलाता है कि पक्षी घर की सजावट की वस्तु नहीं, बल्कि खुले आसमान के मालिक हैं। यह दिन हमें 'अहिंसा परमो धर्म:' के उस सिद्धांत की याद दिलाता है जिसे हम आधुनिकता की दौड़ में भूलते जा रहे हैं। सामूहिक उत्तरदायित्व संरक्षण का कार्य केवल सरकार या वन विभाग का नहीं है। एक समाज के रूप में हमें आगे आना होगा: शहरी क्षेत्रों में 'बर्ड बॉक्स' और 'बर्ड फीडर' का चलन बढ़ाना होगा। देसी पेड़ों (नीम, पीपल, बरगद) का रोपण करना होगा, जो पक्षियों को आश्रय प्रदान करते हैं।।जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा ताकि पक्षियों को जहरमुक्त भोजन मिल सके। छात्रों को पक्षी दर्शन के लिए प्रेरित करना होगा ताकि उनमें प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता जागृत हो ।पक्षी हमारी दुनिया के रंग और संगीत हैं। उनका विलुप्त होना एक मौन त्रासदी है। प्राचीन भारत ने हमें उनके साथ सह-अस्तित्व सिखाया, और आधुनिक विज्ञान हमें उनके महत्व की चेतावनी दे रहा है। यदि आज हमने उनके संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां पक्षियों को केवल किताबों और डिजिटल चित्रों में ही देख पाएंगी। राष्ट्रीय पक्षी दिवस पर हमारा संकल्प होना चाहिए— 'आकाश उनका अधिकार है, और उनकी सुरक्षा हमारा कर्तव्य।' आइए, हम अपनी खिड़कियों पर पानी का एक कटोरा और मन में उनके लिए थोड़ी जगह बचाकर इस दिवस को सार्थक बनाएं।


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