केकरा से करीं संस्कार के बात
केकरा से करीं संस्कार के बात ,जन जन में अहंकार भरल बा ।
लालच ईर्षा त भरल बा सबमें ,
निश्छल प्यार सबमें मरल बा ।।
बोली निकले कउआ अईसन ,
मन में सब व्यवहार सड़ल बा ।
जाॅंत के पल्ला हो गईल चिकन ,
जईसे जाॅंत झीकटा दरल बा ।।
दिमाग भईल सबके अईसन ,
जईसे बुद्धि बकरी चरल बा ।
रोग घुस गईल जेकरा तन में ,
लोग कहे डाईन के करल बा ।।
जईसे आवे जीवन में पतझड़ ,
प्रेम व्यवहार पात झरल बा ।
टूटल पुरान प्रेम रूपी रस्सा ,
अब उ रस्सा कहाॅं बड़ल बा ।।
करम ना करीं हमहूॅं आपन ,
उल्टे कहीं किस्मत जड़ल बा ।
बढ़ नईखे पावत हाथ केहूके ,
सामने थरिया भात पड़ल बा ।।
रिश्ता बढ़े ससुरार सढ़ुवाना ,
खटाई में बाकी नात पड़ल बा ।
चहल पहल ना मिले घर में ,
दिने में जईसे रात भरल बा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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