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निर्दोष होकर भी...

निर्दोष होकर भी...

संजय जैन

बदनाम हमें उन्होंने कर दिया
बेदाग खुदको बताने के लिए।
इस जहर को हम पी गये
बस एक जाम समझकर।।


दुनिया के जुल्मों का हम
अब कैसे प्रतिकार करें।
खुदको अब निर्दोष कैसे
हम अब कैसे साबित करें।।


पलकों पर हमनें जिसको
अपने बैठायें रखा था।
मुझे क्या पता था की
वो ही बदनाम कर देंगे।।


जमाने ने तो कालिक
मेरे चेहरे पर पोत दी।
निर्दोष होकर भी हम
दोषी बनकर जी रहे।।


आँखो में शर्म हाया अब
बिल्कुल भी बची नही है।
जो अब अपनी आँखे
किसी और से मिला सके।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई


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