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मेधा का वनवास और व्यवस्था का चाबुक

मेधा का वनवास और व्यवस्था का चाबुक

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब संचित असंतोष एक ज्वालामुखी बनकर फूटता है। पिछले 48 घंटों में यूजीसी (UGC) के नियमों को लेकर देशव्यापी उबाल और सवर्ण समाज (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ) का सड़कों पर उतरना इसी 'ऐतिहासिक लावा' के फटने का संकेत है। जब राष्ट्रीय मीडिया के दिग्गज पत्रकार सत्ता से तीखे सवाल पूछने लगें, जब सत्तापक्ष के सांसद और विधायक अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावती सुर अपना लें, और जब आम नागरिक अपने घरों से राजनीतिक झंडे उतारने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि मामला अब केवल एक नीतिगत बदलाव का नहीं, बल्कि 'अस्तित्व की लड़ाई' का है।
यूजीसी के हालिया दिशा-निर्देशों ने शिक्षा जगत में उस बहस को पुनर्जीवित कर दिया है, जिसे दशकों से दबाया जा रहा था। सवर्ण युवाओं का आरोप है कि इन नियमों के माध्यम से उच्च शिक्षा और शोध के अंतिम बचे हुए द्वारों पर भी 'जातिगत पहरा' बैठाया जा रहा है। कॉलेजों में छात्राओं का प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर 'योग्यता की हत्या' जैसे ट्रेंड्स यह बताते हैं कि छात्र अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि समान अवसर चाहते हैं। वरिष्ठ वकीलों और शिक्षाविदों का मानना है कि यदि शिक्षा के सर्वोच्च स्तर पर भी मेधा (Merit) को दरकिनार किया गया, तो भारत की वैश्विक साख गिरना तय है।
आजादी के समय आरक्षण को एक घाव पर मरहम के रूप में लगाया गया था, लेकिन आज वह मरहम ही सवर्ण युवाओं के लिए 'नासूर' बन गया है। 50% की संवैधानिक सीमा अब केवल कागजों तक सीमित रह गई है। विभिन्न राज्यों में वोट बैंक के लालच में इस सीमा को लांघा जा रहा है। सवर्ण युवाओं की व्यथा को आशुतोष मिश्रा (प्रयागराज) के उदाहरण से समझा जा सकता है। 98% अंक लाने वाले आशुतोष कहते हैं, "मेरे पिता मंदिर के पुजारी हैं, हमारा घर मुश्किल से चलता है। लेकिन जब मैं फॉर्म भरता हूँ, तो मुझे 'संपन्न' मान लिया जाता है और मुझसे कम अंक लाने वाले को 'वंचित'। क्या गरीबी केवल कुछ विशेष जातियों की जागीर है?" 10% EWS आरक्षण एक राहत के रूप में आया तो था, लेकिन उसकी विसंगतियों और सीमित सीटों ने सवर्णों के बीच 'गरीब बनाम अति-गरीब' का संघर्ष पैदा कर दिया है। इस आक्रोश का सबसे बड़ा कारण SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की वर्तमान स्थिति है। 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोषों को बचाने के लिए 'प्रारंभिक जांच' का सुरक्षा चक्र दिया था, तो सवर्णों को लगा था कि न्याय की जीत हुई है। लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के कारण सरकार ने संसद में कानून बदलकर उस सुरक्षा चक्र को तोड़ दिया। ग्वालियर के विक्रम सिंह की कहानी इस कानून के दुरुपयोग का जीवंत प्रमाण है। एक सामान्य विवाद में उन पर SC/ST एक्ट लगा, वे जेल गए, और उनका मल्टीनेशनल कंपनी का जॉब ऑफर रद्द हो गया। दो साल बाद जब वे निर्दोष साबित हुए, तब तक उनका भविष्य तबाह हो चुका था। सवर्ण समाज का सवाल सीधा है: "बिना जांच गिरफ्तारी का यह चाबुक केवल सवर्णों की पीठ पर ही क्यों चलता है? क्या एक निर्दोष सवर्ण का मानवाधिकार, मानवाधिकार नहीं है?"
सरकारी आंकड़ों के मायाजाल को देखें तो 'जनरल कैटेगरी' के युवाओं के लिए स्थितियां भयावह हैं। पिछले एक दशक में सरकारी नौकरियों के विज्ञापनों में 30% की कमी आई है। इस 'सिकुड़ते हुए अवसरों के तालाब' में सवर्ण युवा सबसे पीछे खड़ा है। दलित और पिछड़ा वर्ग कल्याण के लिए आवंटित हजारों करोड़ के मुकाबले सवर्ण कल्याण बोर्डों को मिलने वाला फंड 'ऊंट के मुंह में जीरा' है। क्रीमी लेयर का अभाव: यह सबसे बड़ी विडंबना है कि आरक्षित वर्गों में 'संपन्न' हो चुके लोग (जैसे आईएएस-आईपीएस के बच्चे) भी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं, जबकि एक गरीब भूमिहार या ब्राह्मण का बच्चा संसाधनों के अभाव में संघर्ष कर रहा है।
जब किसी राष्ट्र की प्रतिभा को उसकी जाति के कारण अपमानित किया जाता है, तो वह प्रतिभा 'पलायन' का रास्ता चुनती है। आज नासा (NASA) से लेकर सिलिकॉन वैली तक भारतीय मेधा का जो डंका बज रहा है, उसका एक कड़वा सच यह भी है कि उनमें से अधिकांश युवा भारत की 'आरक्षण प्रणाली' और 'अवसरों की कमी' से भागकर वहां गए हैं। भारत अपनी बौद्धिक पूंजी को विदेशों में दान कर रहा है और देश के भीतर योग्यता के स्थान पर जातिगत समीकरणों को तरजीह दे रहा है।
हालिया 48 घंटों में जो हुआ, वह अभूतपूर्व है। भाजपा सांसद मनन मिश्रा और कई विधायकों की नाराजगी यह बताती है कि सवर्णों का 'पारंपरिक वोट बैंक' अब दरक रहा है। लोगों का अपने घरों से भाजपा के झंडे हटाना इस बात का प्रतीक है कि "पहले पेट और सम्मान, बाद में पार्टी और विधान।" ओलंपियन विजेंद्र सिंह और योगेश्वर दत्त जैसे राष्ट्रनायकों का इस विरोध में स्वर मिलाना यह सिद्ध करता है कि यह पीड़ा अब समाज के हर वर्ग तक पहुँच चुकी है।
सवर्ण समाज अब 'टुकड़ों' में मिलने वाली रियायतों से संतुष्ट नहीं है। उनकी मांगें अब बुनियादी बदलाव की ओर हैं:: धारा 18A को समाप्त कर सुप्रीम कोर्ट के 2018 के दिशा-निर्देशों (प्रारंभिक जांच) को बहाल किया जाए।: आरक्षण का आधार पूर्णतः 'आर्थिक' हो और 'क्रीमी लेयर' को हर स्तर पर लागू किया जाए। समान दंडात्मक संहिता: किसी भी व्यक्ति पर कार्रवाई उसके अपराध के आधार पर हो, न कि उसकी या पीड़ित की जाति के आधार पर।यूजीसी नियमों के खिलाफ उठा यह तूफान केवल एक प्रशासनिक विरोध नहीं है, बल्कि यह उस 'नये भारत' की पुकार है जो जातिगत बेड़ियों से मुक्त होकर योग्यता को पूजना चाहता है। यदि सरकार ने इन 48 घंटों के आक्रोश को केवल एक 'अस्थायी हलचल' समझकर नजरअंदाज किया ।
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