Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

हिन्दुत्व और हिन्दू संस्कार

हिन्दुत्व और हिन्दू संस्कार

जय प्रकाश कुवंर
आज कल भारतवर्ष में हिन्दूत्व की चर्चा बड़े जोर शोर से सब जगह हो रही है। लेकिन हिन्दू संस्कारों की चर्चा कहीं नहीं होती है और हिन्दू संस्कार धीरे धीरे विलुप्त होते चले जा रहे हैं। हिन्दूत्व महज एक धर्म नहीं है, बल्कि इसके साथ बहुत सारे संस्कार जुड़े हुए हैं। और ये संस्कार ही हमें हिन्दू बनाते हैं। हमारे संस्कार हमारी केवल परंपरा नहीं हैं, बल्कि हमारे जीवन को अनुशासित, नैतिक और सार्थक बनाने की प्रक्रिया हैं। हमारे संस्कार ही हमको भारतीय संस्कृति से जोड़ते हैं।
हिन्दू धर्म में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक १६ संस्कार निर्धारित हैं। जैसे:- गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। ये संस्कार व्यक्ति के गर्भ में आने से लेकर व्यक्ति के मृत्यु तक जीवन के विभिन्न चरणों को पवित्र करते हैं। इनका उद्देश्य व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक विकास करना होता है। संस्कार मानव जीवन में दोष मार्जन और गुणों का विकास करने के लिए आवश्यक माने जाते हैं।
पर सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि आज हिन्दू समाज के नयी पीढ़ी को समस्त १६ संस्कारों का अनुपालन करना तो बड़े दूर की बात हो गई है, वे अब मुख्य पांच यथा नामकरण, विद्यारंभ, उपनयन, विवाह और अंत्येष्टि, का भी सही ढंग से पालन नहीं कर पा रहे हैं। और इस तरह हमारे हिन्दू समाज की नयी पीढ़ी संस्कार विहीन होती जा रही है।
मानव जीवन में प्रत्येक संस्कार के लिए एक निर्धारित उम्र है। खासकर प्रमुख ५ के लिए तो उम्र सीमा एकदम ही निहायत मानी जाती है। जैसे:-
नामकरण- जन्म के १२ वें दिन
विद्यारंभ - ५ वर्ष की आयु में
उपनयन - ५ वर्ष से १२ वर्ष के अंदर
विवाह - युवावस्था, यानि १८ से २५ वर्ष के अंदर
अंत्येष्टि - मरणोपरांत तुरंत।
इन प्रमुख ५ संस्कारों की निर्धारित उम्र के लिहाज से विवेचना करने पर पाते हैं कि इनमें से एक का भी अनुपालन आज के हिन्दू समाज में सही ढंग से नहीं हो रहा है। एक मात्र अंत्येष्टि संस्कार कमोबेश मरणोपरांत तुरंत या एक दो दिन में कुछ निकट संबंधियों के आगमन के तुरंत बाद कर दिया जाता है। बाद बाकी ४ संस्कार तो मन मर्जी अनुसार हिन्दुओं द्वारा अनुपालन किये जा रहे हैं।
नामकरण :- मानव जन्म के बाद यह पहला संस्कार है। आज कल जन्म के बाद एक साल तक बच्चों को बाबू, राजा आदि कहकर काम चलाया जाता है। तदुपरांत सोनू, मोनू, गुलू , गुड़िया, बेबी आदि से काम चलाया जाता है। फिर जब ढाई साल होते होते स्कूल में भर्ती करने की बारी आती है तो कोई मन मुताबिक नाम दे दिया जाता है और इस प्रकार बच्चों का उम्र भर के लिए नामकरण हो जाता है।
विद्यारंभ :- हमारे संस्कारों में विद्यारंभ की उम्र ५ वर्ष बतायी गयी है। लेकिन आज कल लोग बच्चे का उम्र ढाई से तीन साल होते ही उसे स्कूल भेजना या फिर होस्टल में डालना शुरू कर दे रहे हैं। बहुत सारे स्कूल प्ले एण्ड लर्न आदि खुल गये हैं। इससे स्कूल को भी आमदनी हो जा रही है और अभिभावक भी बच्चे को पालने के झंझट से छुटकारा पा जा रहे हैं। बहुत सारे अभिभावक तो मर्द स्त्री दोनों नौकरी करते हैं जिससे वे इसी उम्र में बच्चे को स्कूल के होस्टल में भर्ती करके बच्चे को पालने और उसे प्यार एवं प्रारंभिक ज्ञान देने से मुक्ति पा जा रहे हैं। अब खुद सोचा जा सकता है कि ऐसे बच्चे क्या संस्कार सिखेंगे जो स्कूल होस्टल में पल बड़े हो रहे हैं या फिर जिनकी परवरिश दाई नौकरों के हाथों हो रही है । बच्चे का पहला गुरु उसके माता पिता होते हैं जो बच्चे को ज्ञान और संस्कार सिखाते हैं।
उपनयन :- हमारे हिन्दू समाज में उपनयन संस्कार को विवाह संस्कार से भी बड़ा और महत्वपूर्ण माना जाता है।पहले बच्चे का उम्र बारह साल हो जाय इसके पहले धुमधाम से उपनयन अथवा यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता था। उपनयन संस्कार में ब्राह्मण गुरु उन्हें गुरु मंत्र देते थे, जिससे बच्चे संस्कारी बनते थे और उनका शिक्षा तथा सर्वांगीण विकास होता था। यह उम्र बच्चों का गुरु जी के पास जाने का समय होता था। आज कल ज्यादातर मामलों में उपनयन संस्कार भी शादी के साथ ही हो रहा है , भले ही शादी ३०-३५ साल के उम्र में क्यों न हो,और बिना मुंडन किये जनेऊ पहना दिया जा रहा है और यज्ञोपवीत संस्कार का नियम पूरा कर दिया जा रहा है । इससे शादी के उम्र तक बच्चे गुरु मंत्र से वंचित रह जाते हैं। और उनमें समुचित संस्कार के जगह बहुत सारी बुराईयां जन्म ले ले रही हैं।
विवाह :-विवाह एक ऐसा संस्कार है जिसमें दो अनजान प्राणी ( पुरुष और स्त्री ) अपने अलग अलग अस्तित्वों को मिटाकर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। यह हिन्दू संस्कृति का कभी न टुटने वाला एक पवित्र धार्मिक संस्कार है। विवाह के साथ ही आदमी गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। विवाह संस्कार समाज को अनुकूल व्यवस्था और विकास प्रदान करने में सहायक होता है। विवाह से गृहस्थ अपनी नयी पीढ़ी बनाने का कार्य करते हैं।
हमारे धर्म शास्त्रों और हिन्दू संस्कृति में विवाह का सबसे उपयुक्त समय २५ वर्ष बताया गया है। आज कल के कानूनी प्रणाली में भी लड़की का शादी का उम्र २१ तथा लड़कों का २५ साल तय किया गया है। मर्यादित विवाह भी बार बार नहीं बल्कि एक बार ही उम्र भर के लिए बताया गया है।
लेकिन बिडम्बना यह है कि आज कल शादियों में उम्र की सीमा अब नहीं रह गई है। हर लड़की लड़का पहले शिक्षा ग्रहण कर अपना कैरियर बनाना चाहता है उसके बाद ही शादी के बारे में सोचता है। इस क्रम में उनकी उम्र ३५ वर्ष के लगभग पहुँच जा रही है। फिर उनके च्वाइस की शादी होती है। प्रेम विवाह, अनुबंध शादी और लिव इन रिलेशनशिप जैसी अनेक शादियां आज कल चल पड़ी हैं।
इन सारे मामलों में देखा यही जा रहा है कि बहुत कम शादियां ही ताउम्र ठीक पाती हैं। बहुत शादियों में कुछ समय के बाद ही डाइभोर्स होते देखा जा रहा है। अगर इस अवधि कोई बच्चा जन्म ले लिया है तो डाइभोर्स के बाद उस बच्चे का जीवन असाधारण या फिर कष्टमय हो जाता है। उस बच्चे का पालन पोषण माता पिता में कौन करेगा यह कोर्ट तय करता है। इस तरह से पलने वाला बच्चा का दिमाग किस दिशा में विकसित होगा और कितना संस्कारी होगा यह सोचने वाली बात है।
कुछ हालात में देखा जा रहा है कि एक पुरुष से शादी फिर डाइभोर्स होते ही लड़का लड़की द्वारा दुसरी शादी कर ली जाती है। शादी व्याह संस्कार के मामले में ये सारी विकृतियाँ आज कल बढ़ती ही जा रही हैं।
इस पूरे प्रकरण को हम गौर से देखें और अध्ययन करें तो यही लगता है कि हमारे सभी शास्त्र सम्मत हिन्दू संस्कार धीरे धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं और हमलोग झूठा हिन्दुत्व का डंका पिटने में मशगूल हैं।
मेरा विचारऔर मानना यह है कि अगर हमारी वर्तमान और अगली पीढ़ी अपने शास्त्र सम्मत हिन्दू संस्कारों का सही तौर से अनुपालन करने लग जाये तो किसी को हिन्दुत्व को जगाने और डंका पिटने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि सोया हुआ हमारा हिन्दुत्व फिर से स्वयं जग जाएगा और विश्व में फिर से सभी धर्मों का सिरमौर बन जाएगा और परिस्कृत उन्नत हिन्दुत्व कहलाएगा।

हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ