सपनों का अश्व और हिम्मत की उड़ान
सत्येन्द्र कुमार पाठक
एक सुंदर गाँव में तीन भाई रहते थे—आठ साल का दिव्यांशु, सात साल का शशांक और नन्हा तीन साल का प्रियांशु। उनके साथ उनकी जान से प्यारी दो साल की छोटी बहन पुच्ची भी रहती थी। घर में खुशियों का माहौल तब और बढ़ जाता जब दादाजी अपनी पुरानी कहानियों का पिटारा खोलते और माता-पिता बच्चों को नए-नए सपने देखने के लिए प्रोत्साहित करते। दिव्यांशु बचपन से ही थोड़ा अलग था। जहाँ दूसरे बच्चे खिलौनों से खेलते, दिव्यांशु अक्सर ऊँचे पहाड़ों और नीले आसमान को देखकर खो जाता। उसका सबसे बड़ा सपना था एक सफेद शक्तिशाली घोड़े पर सवार होकर दुनिया की सैर करना।
एक दिन गाँव के मेले में एक घुड़सवारी की प्रतियोगिता की घोषणा हुई। गाँव के कुछ लोगों ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "अरे, ये तो बच्चों का काम नहीं है, इसके लिए बहुत बड़ा होना पड़ता है।"शशांक थोड़ा उदास हो गया और बोला, "भैया, शायद वे सही कह रहे हैं। हम अभी बहुत छोटे हैं।"तभी दिव्यांशु ने शशांक का कंधा थपथपाया और गर्व से कहा, "शशांक, इंसान कद से नहीं, अपनी सोच से बड़ा होता है। अगर हम बड़ा सोचेंगे, तभी तो उसे पूरा करने का रास्ता खोजेंगे।" नन्हे प्रियांशु ने भी अपनी तुतली आवाज़ में हामी भरी, "हाँ भैया, बड़ा सोचो!" दिव्यांशु ने तय किया कि वह इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेगा। उसके पास असली घोड़ा नहीं था, तो उसने लकड़ी और पुराने बोरे की मदद से एक काल्पनिक घोड़ा बनाया। वह रोज़ सुबह जल्दी उठकर दौड़ने का अभ्यास करता। शशांक उसका 'कोच' बन गया और प्रियांशु अपनी छोटी बाल्टी से 'घोड़े' को पानी पिलाने का नाटक करता।
माता-पिता बच्चों के इस टीम वर्क को देख रहे थे। पिताजी ने दिव्यांशु की लगन देखकर उसके लिए एक असली छोटे टट्टू का इंतज़ाम किया। दादाजी ने उसे घुड़सवारी के गुर सिखाए। उन्होंने कहा, "बेटा, घोड़े की लगाम पकड़ने से पहले अपनी डगमगाती हिम्मत को थामना सीखो।" प्रतियोगिता का दिन आ गया। बड़े-बड़े घुड़सवार वहाँ मौजूद थे। दिव्यांशु जब अपने सफेद घोड़े पर सवार होकर मैदान में उतरा, तो वह किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी—वही 'बड़ी सोच' वाली चमक। खेल शुरू हुआ। दिव्यांशु ने बहुत ही कुशलता से घोड़े को दौड़ाया। जब आखिरी बाधा (Hurdle) आई, तो एक पल के लिए उसका घोड़ा झिझका। भीड़ में सन्नाटा छा गया। तभी दिव्यांशु को अपनी छोटी बहन पुच्ची की आवाज़ सुनाई दी, जो ज़ोर-ज़ोर से ताली बजा रही थी। दिव्यांशु ने अपनी आँखें बंद कीं, खुद को एक महान योद्धा के रूप में सोचा और घोड़े के कान में बुदबुदाया, "चलो दोस्त, हमें बड़ा करना है!" एक लंबी छलांग के साथ उसने बाधा पार कर ली और जीत की रेखा को छू लिया।
पूरा गाँव तालियों से गूँज उठा। जब उसे ट्रॉफी दी गई, तो उसने उसे अपने भाइयों और बहन के साथ साझा किया।
दादाजी ने उसे गले लगाते हुए कहा, "आज तुमने साबित कर दिया कि सपने देखने की कोई उम्र नहीं होती। जिसने बड़ा सोचा, वही बड़ा बना।" माता-पिता की आँखों में गर्व के आँसू थे। यह कहानी हमें सिखाती है कि बाधाएं उतनी बड़ी नहीं होतीं जितना हम उन्हें मान लेते हैं। यदि हमारा इरादा पक्का हो और हम खुद को छोटा समझना छोड़ दें, तो आसमान की ऊँचाइयां भी कम पड़ जाती हैं।
नन्हे खोजियों का जादुई बगीचा
दिव्यांशु की जीत के बाद घर में आत्मविश्वास की एक नई लहर दौड़ गई थी। अब 7 साल के शशांक और 3 साल के प्रियांशु ने भी तय किया कि वे कुछ 'बड़ा' करेंगे। गाँव के किनारे एक बंजर जमीन का टुकड़ा था जहाँ कोई नहीं जाता था। वह हिस्सा सूखा और पथरीला था। शशांक ने उसे देखकर कहा, "क्यों न हम यहाँ एक 'जादुई बगीचा' बनाएँ? ऐसा बगीचा जहाँ पुच्ची के लिए रंग-बिरंगे फूल हों और हमारे लिए मीठे फल।"
दिव्यांशु ने मुस्कुराकर कहा, "सोच तो बहुत बड़ी है शशांक, पर इस सूखी जमीन पर हरियाली लाना मुश्किल होगा।"
शशांक ने सीना तानकर वही बात दोहराई जो उसने दिव्यांशु से सीखी थी: "भैया, जब बड़ा सोच ही लिया है, तो मेहनत से क्या डरना?" अगले दिन से ही मिशन शुरू हो गया। शशांक ने अपनी पुरानी साइकिल में एक छोटी टोकरी बाँधी और दूर नदी से उपजाऊ मिट्टी लाने लगा। प्रियांशु का काम सबसे महत्वपूर्ण था—बीजों की रखवाली। वह अपनी छोटी जेबों में इमली, आम और फूलों के बीज भरकर घूमता।
2 साल की पुच्ची भी पीछे नहीं थी; वह अपने छोटे खिलौना-फव्वारे से पौधों को 'दिखावे' का पानी देती, जिससे सबका उत्साह बना रहता। माता-पिता ने देखा कि बच्चे धूप में पसीना बहा रहे हैं। माँ ने उनके लिए नींबू पानी बनाया और पिताजी ने कुछ खाद लाकर दी। दादाजी एक पुरानी कुर्सी डालकर वहीं बैठ गए और उन्हें बताने लगे कि कौन सा बीज कितनी गहराई में बोना चाहिए। एक रात बहुत ज़ोर की बारिश हुई। छोटे-छोटे पौधे बहने का डर था। शशांक घबरा गया, "हमारी मेहनत बेकार हो जाएगी!" तभी तीनों भाई—दिव्यांशु, शशांक और नन्हा प्रियांशु—रात में ही टॉर्च लेकर बाहर निकले। उन्होंने पुरानी बोरी और लकड़ियों से पौधों के चारों ओर एक छोटी बाड़ (Fence) बनाई। प्रियांशु कीचड़ में फिसल गया, लेकिन वह रोया नहीं, बल्कि हँसते हुए बोला, "मिट्टी तो चॉकलेट जैसी है!" उनकी हिम्मत देखकर बारिश भी मानो हार मानता है।
कुछ महीनों बाद, वह बंजर जमीन गाँव का सबसे सुंदर कोना बन गई। वहाँ सूरजमुखी के फूल खिलखिला रहे थे और छोटे-छोटे फलों के पेड़ बड़े होने लगे थे। पूरे गाँव के बच्चे अब वहाँ खेलने आते थे।
दादाजी ने एक तख्ती बनाई और उस पर लिखा— "बच्चों का उपवन"।
उस दिन शशांक को समझ आया कि बड़ा होने का मतलब सिर्फ उम्र बढ़ना नहीं है, बल्कि अपनी मेहनत से दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाना है। दिव्यांशु को गर्व था कि उसके भाइयों ने उसकी 'बड़ी सोच' को हकीकत में बदल दिया।
बड़े काम करने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि एक बड़े और निस्वार्थ संकल्प की ज़रूरत होती है। जब हम मिलकर काम करते हैं, तो बंजर जमीन में भी फूल खिल सकते हैं।
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