सवर्ण: आधुनिक भारत का 'राजनीति की 'कामधेनु'
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत एक ऐसा अद्भुत देश है जहाँ लोकतंत्र की जड़ें पाताल तक गहरी हैं, लेकिन उन जड़ों को सींचने वाला खाद-पानी 'जाति' के टैंकरों से आता है। आज की राजनीति वह सर्कस है जहाँ संविधान की किताब हाथ में लेकर नेता रिंग-मास्टर की तरह चाबुक चलाते हैं, और इस खेल में सबसे ज्यादा 'उछल-कूद' जिस नागरिक को करनी पड़ती है, उसका नाम है—सवर्ण।
. मेधा का 'अंतिम संस्कार' और आरक्षण का उत्सव - अगर आप सवर्ण हैं और आपके पास प्रतिभा है, तो समझ लीजिए कि आपने एक ऐसा गुनाह किया है जिसकी कोई अग्रिम जमानत नहीं है। हमारे देश में 'मेरिट' (योग्यता) अब वह लावारिस लाश है जिसे आरक्षण के पहिए तले कुचलना एक राष्ट्रीय खेल बन गया है। जब एक सवर्ण मेधावी छात्र 95% अंक लेकर खड़ा होता है, तो राजनीति उसे सांत्वना नहीं, बल्कि 'सामान्य श्रेणी' का ठप्पा देकर रेस से बाहर कर देती है। यूजीसी (UGC) से लेकर लोकसभा तक, आरक्षण की ऐसी भूलभुलैया बुनी गई है कि सवर्ण युवा को अपना भविष्य केवल 'पासपोर्ट' और 'वीजा' की कतारों में नजर आता है। नेताओं के लिए सवर्णों की गरीबी 'नकली' है और उनका संघर्ष 'विशेषाधिकार' । विडंबना देखिए, जिस सवर्ण समाज ने देश को तिलक, आज़ाद और विवेकानंद दिए, आज उसी समाज के बच्चों को 'प्रतिभा पलायन' के लिए मजबूर किया जा रहा है ताकि राजनीति का 'वोट बैंक' सुरक्षित रहे। हमारे लोकतंत्र का सबसे बड़ा 'सस्पेंस थ्रिलर' उसकी धर्मनिरपेक्षता है। यह वह तराजू है जिसका एक पलड़ा हमेशा सवर्णों के मंदिरों पर टिका होता है। आदि शंकराचार्य ने जिन मठों और मंदिरों को सांस्कृतिक अखंडता के लिए स्थापित किया था, आज उन पर 'सरकारी बाबुओं' का कब्जा है। मंदिर का चढ़ावा सरकार का है, मंदिर की संपत्ति सरकार की है, लेकिन जब मंदिरों की परंपराओं की बात आती है, तो वही सरकार 'आधुनिकता' का पाठ पढ़ाने लगती है। क्या किसी राजनीतिज्ञ में इतनी हिम्मत है कि वह चर्च या मस्जिदों के प्रबंधन के लिए सरकारी बोर्ड बना दे? नहीं! क्योंकि वहां 'संवैधानिक मर्यादा' आड़े आ जाती है। लेकिन सवर्णों के मंदिरों के मामले में संविधान की व्याख्या बदल जाती है। यह 'चुन-चुनकर की गई धर्मनिरपेक्षता' (Selective Secularism) ही आधुनिक भारत का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
नेताओं के लिए हिन्दू धर्मग्रंथ अब केवल 'गाली देने' के काम आते हैं। वेदों, पुराणों और मनुस्मृति को 'मनुवादी' कहकर कोसना एक ऐसा प्रमाण-पत्र है जो आपको रातों-रात 'क्रांतिकारी' बना देता है। राजनीतिज्ञ इन ग्रंथों की आलोचना करते नहीं थकते, लेकिन जब किसी अन्य मजहब की कुरीतियों पर बात होती है, तो वे अचानक 'संविधान के प्रहरी' बन जाते हैं। यह कैसी आज़ादी है जहाँ बालगंगाधर तिलक के 'स्वराज्य' की बात करने वाला सवर्ण आज अपने ही देश में 'सांस्कृतिक शरणार्थी' की तरह महसूस करता है? जहाँ मुगलों के अत्याचारों को 'तारीख' के पन्नों से धोया जाता है और राणा प्रताप व शिवाजी महाराज के संघर्ष को 'सीमित' कर दिया जाता है।
न्याय का सिद्धांत कहता है कि अपराधी को सजा मिले, लेकिन राजनीति कहती है कि 'वोट' मिलना चाहिए। SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट आजकल वह ब्रह्मास्त्र है, जिसे सवर्णों की गर्दन पर लटका दिया गया है। 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर इसमें सुधार की कोशिश की, तो पूरी सियासत ने सड़कों पर तांडव कर दिया।
नेताओं ने संसद का दरवाजा खोलकर कोर्ट के विवेक को ही बाहर निकाल दिया। आज सवर्ण समाज इस खौफ में जीता है कि कहीं कोई छोटी सी रंजिश उसके पूरे परिवार को बिना जांच के सलाखों के पीछे न धकेल दे। यह 'जाति आधारित न्याय' लोकतंत्र के गाल पर एक करारा तमाचा है। देश की अर्थव्यवस्था सवर्णों के टैक्स से चलती है, सीमाएं सवर्णों के शौर्य से सुरक्षित रहती हैं, और संस्कृति सवर्णों के संस्कारों से जीवित है। लेकिन जब अधिकारों की बारी आती है, तो उसे 'अगड़ा' कहकर कतार के अंत में खड़ा कर दिया जाता है। वह टैक्स देने के लिए 'बहुसंख्यक' है, लेकिन हक मांगने के लिए 'अल्पसंख्यक' से भी बुरा है।राजनीतिज्ञों ने सवर्णों को एक ऐसी 'कामधेनु' समझ लिया है जिसे चारा नहीं देना है, बस दूध दुहना है। लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि जिस समाज ने हजारों साल की गुलामी के बाद भी अपनी संस्कृति को बचाए रखा, वह अब जाग रहा है। सवर्ण अब केवल 'वोट' देने की मशीन नहीं, बल्कि अपनी मेधा, अपने मंदिरों और अपने मान-सम्मान के लिए सवाल पूछने वाला नागरिक बनना चाहता है। नेताओं को यह समझना होगा कि सवर्णों का विरोध किसी समुदाय से नहीं, बल्कि उस 'सिस्टम' से है जो योग्यता का कत्ल करता है। यदि समय रहते 'समानता' के वास्तविक अर्थ को नहीं समझा गया, तो लोकतंत्र का यह महल अपने ही बोझ से ढह सकता है।
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