कविता
अरुण दिव्यांशकविता गाई नहीं जाती ,
कविता तो पढ़ी जाती है ।
स्वयं नहीं उभरे कविता ,
कविता तो गढ़ी जाती है ।।
कविता लेती है कई रूप ,
कविता निखार लाती है ।
बदल लेती लय - सुर तो ,
हर हृदय में प्यार लाती है ।।
कविता बनती गीत संगीत ,
कविता ही बनती प्रीत है ।
न बदले जब रूप कविता ,
कविता ही संस्कार रीत है ।।
कविता नहीं डालडा होती ,
कविता तो सुगंधित घृत है ।
कविता नहीं दुश्मन बनाए ,
कविता तो रिश्ता मीत है ।।
जिंदादिल का नाम कविता ,
कविता नहीं कभी मृत है ।
कविता होती न विष कभी ,
कविता ये जीवन अमृत है ।।
कविता ही पावन चित्त है ,
कविता जीवन पे जीत है ।
कविता भलाई बुराई अंतर ,
दोनों कविता बनी भीत है ।।
कविता नहीं हत्या है करती ,
बुराई ही होता भयभीत है ।
कविता न करे अहित कहीं ,
कविता तो जीवन हित है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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