"मौन का अवशेष"
पंकज शर्माशब्द
जब थककर बैठ जाते हैं
तो समय की हथेली पर
एक सूक्ष्म विराम उग आता है—
न कोई घोषणा,
न कोई प्रतिज्ञा,
बस साँसों के बीच
ठहरा हुआ अर्थ।
मौन
कोई रिक्तता नहीं
यह भीतर उतरती हुई
दीर्घ यात्रा है—
जहाँ स्मृतियाँ
अपने भार से मुक्त होकर
अनाम हो जाती हैं
और मैं
अपने ही प्रश्न से छूटता हूँ।
चुप्पी के इस विस्तार में
अहंकार
दीवार नहीं रह जाता,
केवल धूल बनता है
जो दृष्टि को ढकता था—
और धूल के बैठते ही
मन का आकाश
स्वयं को देख पाता है।
यहाँ
न साधक है,
न साधना,
न कोई लक्ष्य
जिसकी ओर उँगली उठे—
ध्यान
किसी बिंदु पर नहीं,
ध्यान
खुद में विलीन
एक निर्विकार स्थिति।
जब सब कुछ
छूटता है—
नाम, पहचान,
संग्रह और आग्रह—
तब जो शेष रहता है
वह मेरा नहीं होता,
फिर भी
मैं उसी में
पहचाना जाता हूँ।
मौन
पराजय नहीं,
यह वह क्षण है
जहाँ अस्तित्व
अपने ही प्रश्न से
मुक्त हो जाता है—
और जो बचा रहता है
वह न कहा जा सकता है,
न जाना जा सकता है,
बस
होता है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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