बसंत पंचमी
अरुण दिव्यांशबसंत के बहार आईल ,
मौसम में निखार आईल ,
जन जन में प्यार आईल ,
सर्दी अब त दूर पराईल ।
आदित्य क्रोध भईल कम ,
घामो हो गईल बाटे नम ,
जीवन ई गुलजार भईल ,
सर्दी भईले जईसे बेदम ।
बसंत के भईल उद्घाटन ,
घाम लागे अब उच्चाटन ,
माॅं शारदे के द्वारा भईल ,
बसंत के शुभ देशाटन ।
सर्दी गईल बसंत आईल ,
जन जन बाटे लोभाईल ,
जईसे मिलल उपलब्धि ,
सर्दी जईसे शर्मे नहाईल ।
गईल हवा बादल शासन ,
बसंत आसन जमईले बा ,
तीनों के पावर कम भईल ,
आपन पावर देखईले बा ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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