आया बसंत, आया बसंत
डॉ रश्मि प्रियदर्शनीआया बसंत, आया बसंत। नवजीवन बन छाया बसंत।।
नूतन किरणें, नूतन विहान। गुंजित विहगों का नवल गान।।
अमुआ की डाली महक उठी। कोयलिया काली चहक उठी।।
लग गए झूमने दिग-दिगंत। आया बसंत, आया बसंत।।
वृक्षों पर हरियाली छाई। वल्लरियों ने ली अंगड़ाई।।
छंट गए कुहासे, जग डोला। धरती ने यों घूंघट खोला।
ज्यों दुल्हन पा प्रत्यक्ष कंत। आया बसंत, आया बसंत।।
सरसों के खेतों में बहार। बहकी-बहकी ठंडी बयार।।
रंगों का लगा सुघड़ मेला। भँवरों का करतब अलबेला।।
प्रकृति दिखती है प्राणवंत। आया बसंत, आया बसंत।।
पक-पक कर गिरने लगे बेर। बच्चों ने तरु को लिया घेर।
लग गये हिलाने शाखाएँ। खुद खाएँ, घर भी ले जाएँ।।
स्फूर्ति नयी, खुशियाँ अनंत। आया बसंत, आया बसंत।।
महिलाएँ सज-धज झूम-झूम। लग गईं मचाने मुदित धूम।।
हँस-हँस गुलाल-जल बरसाने। फगुआ, धमार, होली गाने।।
राधा भोली, कान्हा सुमंत। आया बसंत, आया बसंत।।
बज उठे झाल औ' मंजीरे। गंगा के तट, यमुना तीरे।।
पुरुषों की थिरकन,अलमस्ती। मदहोश नगर, बस्ती-बस्ती।।
हरि को ध्याने लग गये संत। आया बसंत, आया बसंत।।
आलस्य त्याग, संसार जगा। सर्दी को रवि ने दिया भगा।।
चल पड़े कर्म-पथ पर सारे। पाने मंज़िल, स्वप्निल तारे।।
लेकर ऊर्जित आभा ज्वलंत। आया बसंत, आया बसंत।।
माँ सरस्वती का स्मरण लिए। सौंदर्य भरा स्फुरण लिए।।
आशाओं का उन्मेष लिए। परिवर्तन का संदेश लिए।।
पतझड़ का करने सुखद अंत। आया बसंत, आया बसंत।।
मिट गई जीर्णता, जर्जरता। चहुँओर प्रेम-निर्झर झरता।।
कुदरत की शोभा मनहारी। यौवनमय लगे धरा सारी।।
सबके मन को भाया बसंत। आया बसंत, आया बसंत।।
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