वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
डॉ राकेश कुमार आर्य
अध्याय - १०
वंदे मातरम का कवियों - साहित्यकारों पर प्रभाव
हम पूर्व में ही उल्लेख कर चुके हैं कि 'वंदे मातरम' का नारा सर्वप्रथम ७ अगस्त १९०५ को कोलकाता के टाउन हॉल में विद्यार्थियों के द्वारा उस समय प्रयोग किया गया था, जब एक विशाल जनसमूह के रूप में एकत्र होकर उन्होंने बंग- भंग के विरोध में मार्च किया था। इस प्रकार उन विद्यार्थियों ने स्वदेशी आंदोलन का शुभारंभ किया। परिणामस्वरूप ' वंदे मातरम' स्वदेशी आंदोलन का भावनात्मक स्वरूप लेकर प्रकट हुआ। लोगों में स्वदेशी वस्तुओं के प्रति एक असीम श्रद्धा का भाव देखा जा रहा था। विदेशी उत्पादों के प्रति लोगों के भीतर घृणा के भाव उत्पन्न हो गए थे। सारा राष्ट्र स्वदेश, स्वसंस्कृति, स्वधर्म, स्वराष्ट्र, स्वभाषा, स्वराज्य के भावों से भर गया था। इस प्रकार ' वंदे मातरम ' का पवित्र नारा ' स्वबोध' जगाने वाला था। राज धर्म सबसे बड़ा होता है, क्योंकि राजनीति के माध्यम से ही अन्य सभी धर्म साधे जाते हैं। किसी भी देश में राजनीति जब सही दिशा पकड़ जाती है अर्थात जब वह ' स्व ' के प्रति समर्पित हो जाती है और इस दिशा में सारे देशवासियों को लेकर चल पड़ती है तो सारे राष्ट्र में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। देश संक्रमण काल से निकलने के लिए तड़प उठता है। जैसे अंडा में पड़ा हुआ चूजा सही समय आने पर बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगता है, वैसे ही इस सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करके राष्ट्र और समाज भी एक नई व्यवस्था में जाने के लिए और छलांग लगाने के लिए अपने आप को तैयार करने लगते हैं। धीरे-धीरे वे पुरानी व्यवस्था को छोड़कर अगली व्यवस्था में जाने के लिए व्याकुल होने लगते हैं। व्याकुलता की इसी चरम सीमा के कारण और सकारात्मक ऊर्जा के इसी संचार से प्रचलित दुर्गन्धित व्यवस्था का विनाश होता है और नई व्यवस्था के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। इसी को ' क्रांति' कहते हैं। भारतवर्ष में इस क्रांति को जगाने में ' वंदे मातरम' की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। बंगाल के विद्यार्थियों ने एकत्र होकर पूरे देश के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संदेश दिया था। सारे देश ने उस ऊर्जा को अनुभव किया और सारे देश का क्रांतिकारी युवा बंगाल की ओर नई और आशा भरी दृष्टि से देखने लगा।
पूरे देश का युवा उस समय प्रचलित व्यवस्था को धू-धू करके जलते हुए देखना चाहता था, उसके लिए उसे तेजस्वी नेतृत्व और तेजस्वी नारे की आवश्यकता थी।
नेतृत्व के बारे में हमारे देश का इतिहास हमें बताता है कि मां भारती की गोद और कोख कभी खाली नहीं हुई। यदि किसी कारणवश कभी गोद भी खाली हुई तो कोख कदापि खाली नहीं हुई। विद्यार्थियों के इस आंदोलन ने नई आशाओं को जन्म दिया। नए नेतृत्व को जन्म दिया। नई सोच को जन्म दिया और लोगों के भीतर आशा और उत्साह का संचार किया। इस आंदोलन में ' वंदे मातरम ' ने हम सब की सामूहिक राष्ट्रीय भावनाओं का नेतृत्व किया। भाषा, प्रांत और संप्रदाय की सारी सीमाओं से ऊपर उठकर हमने उस समय ' राष्ट्रप्रथम' के आधार पर काम करने का संकल्प लिया। इसी संकल्प ने अंग्रेजों को व्याकुल कर दिया था।
रविंद्र नाथ टैगोर और वंदे मातरम
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर का हमारे स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में सम्मान पूर्ण स्थान है । उन्होंने ' वंदे मातरम' को संगीतबद्ध किया था। उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने बंकिम चंद्र चटर्जी के ' वंदे मातरम ' को कांग्रेस के मंच से गाकर लोगों तक पहुंचाने का सराहनीय काम किया। इस गीत के भीतर जिस प्रकार भारतीय जनमानस की भावनाओं को पिरोने का काम किया गया था, उसके चलते लोगों ने भारत माता की कल्पना को साकार रूप देना आरंभ किया। उसे गहराई से समझने का प्रयास किया। इसके पश्चात साहित्यकारों ने भारत माता की वंदना में अनेक गीतों की रचना करनी आरंभ की। भारत माता के प्रति समर्पित इस प्रकार की कविताओं अथवा लेखों ने लोगों को हृदय से प्रभावित किया। इन गीतों ने हमारे लोगों की राष्ट्रीय भावनाओं को उजागर किया और उन्हें एक दूसरे के निकट लाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
गांधी जी और वंदे मातरम
गांधी जी भारतीय इतिहास में मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने किसी भी स्थिति में कभी मुसलमानों को गलत नहीं माना। चाहे किसी भी मुसलमान ने कितना ही बड़ा अपराध या राष्ट्रद्रोह का कार्य क्यों न किया हो, गांधी जी उसका भी तुष्टीकरण करते हुए ही दिखाई दिए। उनका यह पक्षपाती दृष्टिकोण देश के लिए खतरनाक सिद्ध हुआ। अपनी इसी प्रकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण गांधी जी ने ' वंदे मातरम' का कभी खुलकर समर्थन नहीं किया। विशेष रूप से तब जब उन्हें यह पता चला कि मुसलमान ' वंदे मातरम' को अपनी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला मानते हैं। गांधी जी मोपला कांड के समय भी मुसलमानों के साथ खड़े हुए दिखाई दिए। इसके पश्चात जब १६ अगस्त १९४६ को मुस्लिम लीग ने पश्चिम बंगाल में 'सीधी कार्यवाही दिवस' के समय अनेक हिंदुओं की हत्या कर डाली तो उस समय भी गांधी जी मुस्लिम तुष्टिकरण के व्यामोह से बाहर नहीं निकले। अगले ही वर्ष जब देश का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन हुआ तो उस समय भी गांधी जी मुस्लिम तुष्टीकरण के खेल को खेलते रहे थे।
गांधी जी और ' अल्लाह हू अकबर'
जैसे ही गांधी जी को इस बात का पता चला कि मुसलमान ' वंदे मातरम' को अपनी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला मानते हैं तो उन्होंने मुसलमानों का पक्ष पोषण करना आरंभ कर दिया। इसी पक्ष पोषण को इतिहास में ' गांधी जी का मुसलमानों का तुष्टिकरण' के नाम से जाना जाता है। गांधी जी ने ' वंदे मातरम' के संदर्भ में भी मुसलमानों का तुष्टिकरण करने का प्रयास किया। मुस्लिम तुष्टिकरण की अपनी इसी नीति के अंतर्गत उन्होंने ' वंदे मातरम ' की तुलना मुसलमानों के ' अल्लाह हू अकबर' से कर डाली थी । जब उन्होंने कहा था कि ' वंदे मातरम' और ' अल्लाह हू अकबर' एक जैसे ही हैं।
गांधी जी के इस प्रकार के दृष्टिकोण से मुसलमानों के और भी अधिक भाव बढ़ गए थे। यद्यपि यह भी एक सत्य है कि मुसलमानों का ' अल्लाह हू अकबर' और ' वंदे मातरम' दोनों में आकाश पाताल का अंतर है। जहां ' वंदे मातरम' भारत के लोगों के भीतर एकता का भाव उत्पन्न करके राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखता है , वहीं ' अल्लाह हू अकबर' उनका एक ऐसा नारा है जो मुसलमानों के द्वारा गैर मुसलमानों के विरुद्ध लगाया जाता है। यह मुसलमानों को गैर मुसलमानों के विरुद्ध ' जिहाद' की शिक्षा देता है, ' काफिर' और ' कुफ्र' की नीति को लागू करने के लिए एक समुदाय को दूसरे समुदाय के विरुद्ध उकसाता है। जिसमें काफिर के विरुद्ध किया गया प्रत्येक प्रकार का जालिमाना अथवा अत्याचार पूर्ण कृत्य भी पुण्य का कार्य माना जाता है।
अहिंसा के परम उपासक गांधी जी यह नहीं समझ पाए कि ' अल्लाह हू अकबर' उनके अहिंसा वाद के सिद्धांत के विरुद्ध है। जबकि ' वंदे मातरम' भारत की परंपरागत अहिंसावादी नीति को स्थापित कर लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने के लिए कार्य करता है। मुस्लिम संप्रदाय के ' अल्लाह हू अकबर' में एक वर्ग अर्थात गैर मुसलमानों के अधिकारों का शोषण करने पर बल दिया जाता है, जबकि ' वंदे मातरम ' में " सभी का साथ और सभी का विकास " की नीति पर काम किया जाता है।
' आज तक ' की एक खास रिपोर्ट के अनुसार १९२० में असहयोग-खिलाफत आंदोलन आरम्भ होने के कुछ सप्ताह के उपरांत महात्मा गांधी मद्रास (अब चेन्नई) का दौरा कर रहे थे। तब उनके स्वागत में लगाए गए नारों ने उन्हें बेचैन कर दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाले गांधीजी को इस नारे से अलगाव की अनुभूति हुई थी। यह नारा था - वंदे मातरम्।"
कितने दुर्भाग्य की बात है कि गांधी जी को ' वंदे मातरम' से भी अलगाव की अनुभूति हो रही थी।
सुब्रमण्यम भारती और ' वंदे मातरम '
सुब्रमण्यम भारती का भारत के सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वह एक महान तमिल कवि और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाने जाते हैं। उनकी सनातन के प्रति गहन निष्ठा थी। भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा में भी उनकी गहरी श्रद्धा थी। उनके साहित्य लेखन पर ' वंदे मातरम' की झलक स्पष्ट देखी जा सकती है।
उन्होंने बंकिम चंद्र चटर्जी के इस राष्ट्रीय गीत को दक्षिण भारत में लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। सुब्रमण्यम भारती इस जीत से इतने प्रभावित हो गए थे कि उन्होंने इस गीत का तमिल भाषा में अनुवाद भी किया। जैसे ही लोगों को इस गीत का तमिल भाषा में अनुवाद प्राप्त हुआ, वह इस गीत के दीवाने हो गए। उन दिनों भारतवर्ष में भाषा को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं था। सभी सनातनियों में संस्कृत से निकली अपनी सारी भारतीय भाषाओं के प्रति प्रेम का भाव देखा जाता था। सारी भाषाओं को एक ही परिवार की सदस्य माना जाता था। इसलिए किसी भी प्रकार का द्वेषभाव भाषाओं को लेकर लोगों के भीतर नहीं था। कवि होने के उपरांत भी सुब्रमण्यम भारती ने ' वंदे मातरम ' को अपने राष्ट्रवादी लेखन का एक अभिन्न अंग बनाया। उन्होंने लोगों से एकता बनाए रखने और स्वतंत्रता प्राप्त करने का आह्वान किया। लोगों पर अपने इस महान कवि की बातों का विशेष प्रभाव पड़ा। जिससे तमिलनाडु में भी ' वंदे मातरम' लोकप्रिय हो गया। इस प्रकार वंदे मातरम प्रत्येक प्रकार की सीमाओं को लांघकर अपना विस्तार करता जा रहा था।
अरबिंदो और वंदे मातरम
अरविंदो भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतिनिधि साहित्यकार थे। उन पर भी वंदे मातरम का गहरा प्रभाव पड़ा था। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गए वंदे मातरम का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। इसके अतिरिक्त १९०६ - ८ के दौरान उन्होंने ' वंदे मातरम ' नाम के एक राष्ट्रवादी समाचार पत्र के संपादक के रूप में भी कार्य किया था। इस समाचार पत्र के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रवादी क्रांतिकारी विचारों को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया। इस समाचार पत्र के माध्यम से राष्ट्रवाद का प्रचार प्रसार करने में भी उन्हें आशातीत सफलता प्राप्त हुई।'वंदे मातरम' ने उनकी लेखनी को नई ऊंचाई प्रदान की। उनके भीतर क्रांति के भाव फूटे और उन विचारों से राष्ट्र का युवा वर्ग प्रभावित हुआ। ' वंदे मातरम' समाचार पत्र के माध्यम से क्रांतिकारी ओजस्वी लेखों को युवा वर्ग ने हाथों हाथ लिया। उन्होंने संपादक के रूप में इस समाचार पत्र के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों को बहुत सुंदरता के साथ प्रस्तुत करने का कार्य किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें ' राष्ट्रवाद के नेता' के रूप में लोग सम्मान देने लगे।
श्री अरबिन्द घोष द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है-
" मैं आपके सामने नतमस्तक होता हूँ।
ओ माता,पानी से सींची, फलों से भरी,
दक्षिण की वायु के साथ शान्त,
कटाई की फ़सलों के साथ गहरा,
माता!उसकी रातें चाँदनी की गरिमा में प्रफुल्लित हो रही हैं,उसकी ज़मीन खिलते फूलों वाले वृक्षों से बहुत सुंदर ढकी हुई है,हंसी की मिठास, वाणी की मिठास,माता, वरदान देने वाली, आनंद देने वाली।"
इस गीत का उन दिनों अंग्रेजी में अनुवाद कराए जाने का अर्थ था कि इसे न केवल पढ़े-लिखे भारतीय पढ़ें, समझें बल्कि भारत से बाहर रहने वाले वे लोग भी पढ़ें और समझें जो अंग्रेजों के साम्राज्य को भारत से उखाड़ने के लिए कार्य कर रहे थे। अंग्रेजी के अनुवाद का यही लाभ हुआ भी था। कुछ ऐसे चेहरे भी थे जो विदेश में रहकर के भारत के लिए काम कर रहे थे। उन्हें बांग्ला नहीं आती थी। परंतु जब उन्होंने संस्कृत निष्ठ बांग्ला में लिखे इस गीत का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा तो उन्हें बहुत अच्छा लगा।
' वंदे मातरम' को स्वाधीनता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली नारा बनाने में कवियों , लेखकों और साहित्यकारों का विशेष योगदान रहा।
रामप्रसाद बिस्मिल की कविता
रामप्रसाद बिस्मिल की ' मातृभूमि तेरी जय हो' कविता बहुत लोकप्रिय हुई। जो कि इस प्रकार है ,:-
ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो ।
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कान्तिमय हो ।।
अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में,
संसार के हृदय में तेरी प्रभा उदय हो ।
तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो ।।
तेरी प्रसन्नता ही आनन्द का विषय हो ।।
वह भक्ति दे कि 'बिस्मिल' सुख में तुझे न भूले,
वह शक्ति दे कि दुःख में कायर न यह हृदय हो ।।
यदि इस कविता के भावों पर हम ध्यान दें तो स्पष्ट पता चलता है कि राम प्रसाद बिस्मिल की कविता पर ' वंदे मातरम' का सीधा प्रभाव पड़ा था। कविता के भावों में राष्ट्रवाद स्पष्ट दिखाई देता है।
देवी रूप में मां भारती की कल्पना
हमारे कवियों ने मातृभूमि को देवी के रूप में चित्रित किया।
यद्यपि पाषाण पूजा किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं मानी जा सकती, परंतु जब लोगों ने अपनी आस्था से अपनी मातृभूमि को जोड़ लिया और उसे देवी के रूप में पूजने लगे तो उनके भीतर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सागर हिलोरे मारने लगा। इस प्रकार की आस्था ने लोगों को अपनी स्वाधीनता का उपासक बना दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि अपनी मातृभूमि को देवी के रूप में देखकर लोग उसके माध्यम से अपने राष्ट्र की आत्मा से संवाद स्थापित करने में सफल हुए। उन्हें ऐसा लगा कि यदि हम अपनी मातृभूमि के लिए संघर्ष नहीं करेंगे अर्थात उसे स्वाधीन कराने में अपना सहयोग नहीं देंगे तो इससे हमको पाप लगेगा। लोगों ने समझा कि जैसे मां को कभी किसी का गुलाम नहीं बनने दिया जा सकता, वैसे ही अपनी मातृभूमि को भी किसी का गुलाम बने देखना उसके दूध को लजाने जैसा होता है। मां और मातृभूमि को समान दर्जा यद्यपि भारत प्राचीन काल से देता आया है , परंतु इस गीत ने भारत के इस सुप्त संस्कार को जगाने और पुनर्स्थापित करने में अपना अमूल्य सहयोग दिया।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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