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नितिन नबीन की ताजपोशी और चुनौतियां

नितिन नबीन की ताजपोशी और चुनौतियां

डॉ राकेश कुमार आर्य
भाजपा में एक कर्मठ, परिश्रमी और ईमानदार चेहरे के रूप में अपने आप को स्थापित करने वाले 45 वर्षीय नितिन नबीन निर्विरोध भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए हैं। इस अवस्था में पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने वाले वह पहले नेता हैं। उनकी इस नियुक्ति ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा लंबी रेस का घोड़ा है। वह नया नेतृत्व तैयार करने में विश्वास रखती है। लगभग 140 करोड़ लोगों के देश में विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के लिए सुयोग्य अध्यक्ष ढूंढना सचमुच बड़ी चुनौती है। परंतु इसे जिस खूबसूरती के साथ भाजपा ने खोज लिया है, वह अपने आप में अद्भुत है। अद्भुत इसलिए है कि विभिन्न महत्वाकांक्षाओं को एक साथ तोल कर रखना और तनिक भी कहीं से अनुशासनहीनता का कोई संकेत तक न मिलना पार्टी की एकजुटता को प्रकट करता है। कुछ लोगों को इस प्रकार की नियुक्ति पर यह कहने का अवसर मिल सकता है कि यह एकजुटता डंडे के बल पर है ? तब उनसे यह पूछा जा सकता है कि जिन पार्टियों में लोकतंत्र की हत्या करके एक ही परिवार की जागीर बनाकर पार्टियों को उनके हाथों सौंप दिया जाता है, डंडा वहां होता है। क्योंकि वहां पर केवल एक परिवार के प्रति निष्ठा व्यक्त करना सभी के लिए अनिवार्य होता है।
हम सभी जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 1980 में हुई थी। यह भी एक संयोग ही है कि भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नबीन का जन्म भी उसी वर्ष हुआ था।
2006 में जब उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा का देहांत हुआ तो वह पहली बार विधायक बने। वह पांच बार से विधायक चले आ रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने श्री नबीन को युवावस्था में पार्टी की कमान सौंप कर कांग्रेस सहित उन सभी परिवारवादी पार्टियों को यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भाजपा किसी भी प्रकार की परिवारवादी राजनीति को लोकतंत्र के लिए अशुभ मानती है। राष्ट्र के प्रति निष्ठावान युवाओं को पार्टी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने की सुविधा और अवसर प्रत्येक राजनीतिक दल में उपलब्ध होने चाहिए। हम सभी जानते हैं कि कांग्रेस ने रबर स्टैंप के रूप में अपने अध्यक्ष का निर्वाचन श्री खड़गे के रूप में कर तो लिया है परंतु उनकी अवस्था और स्थिति दोनों ही उन्हें इस पद के लिए अयोग्य घोषित करती रही हैं। उनकी यह अयोग्यता ही नेहरू गांधी परिवार के लिए उनकी योग्यता है। इसी प्रकार उन सभी राजनीतिक दलों को हमें देखना चाहिए जो किसी एक परिवार की जागीर बनकर रह गए हैं। भाजपा ने एक युवा को अवसर देकर यह भी स्पष्ट किया है कि पार्टी के बड़े - बुजुर्ग नेता संभालने के लिए अपने युवा अध्यक्ष के चारों ओर खड़े रहेंगे। इस प्रकार उन्हें काम करते हुए अनुभव भी प्राप्त होगा और भाजपा के पास भविष्य के लिए एक योग्य नेतृत्व भी उपलब्ध होगा।
किसी भी वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक होता है कि उसमें 70 - 80 या उससे ऊपर की अवस्था के लोग संरक्षक के रूप में काम करते हुए दिखाई देने चाहिए। जबकि नेतृत्व युवाओं के हाथों में होना चाहिए। इससे युवाओं को न केवल काम करने का अवसर उपलब्ध होता है अपितु वह संगठन के लिए उपयोगी भी बनना चाहते हैं। जहां नेतृत्व बुजुर्ग लोगों के हाथों में होता है, वहां एक प्रकार की घुटन युवा वर्ग में देखी जाती है। यह घुटन किसी भी संगठन अथवा संस्था के लिए आत्महत्या का कारण बनती है।
प्रधानमंत्री श्री मोदी और दूसरे वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने श्री नवीन के समर्थन में नामांकन पत्र दाखिल किये। भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस पार्टी के पास इस समय नरेंद्र मोदी जैसा नेतृत्व उपलब्ध है। जिनके साथ काम करना कई प्रकार के अनुभव दिला सकता है। हम सभी जानते हैं कि जब कांग्रेस की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी अपने चरम पर थीं तो उस समय उन्होंने पार्टी के संगठन को अपने हाथों में ले लिया था। इंदिरा गांधी की यह नीति कांग्रेस के लिए आत्मघाती सिद्ध हुई। कांग्रेस में नेता निर्माण की प्रक्रिया बाधित हो गई। पार्टी और देश दोनों एक ही परिवार से हांके जाने लगे। जिससे परिवार की तानाशाही प्रवृत्ति में वृद्धि हुई। भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य ही रहा कि अन्य परिवारवादी राजनीतिक दलों ने कांग्रेस की मूर्खताओं से कोई शिक्षा नहीं ली। यही कारण रहा कि उन्होंने भी कांग्रेस की परिवारवादी परंपरा को आगे बढ़ा दिया। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस अनुभव से बहुत कुछ सीखा है इसलिए उसने पार्टी विद डिफरेंस की नीति को लेकर काम करना आरंभ किया। अपने अध्यक्ष की प्रक्रिया को जिस प्रकार भारतीय जनता पार्टी अपनाती है, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि वह वास्तव में पार्टी विद डिफरेंस के आधार पर ही काम कर रही है। नितिन नवीन ने अपनी मेहनत, ईमानदारी और जिज्ञासु भाव से इस पद को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत गुण ही उसे ऊंचाई पर भेजने में सहायक होते हैं। यदि व्यक्ति स्वयं में अवगुणी है तो वह कभी ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। वह एक सूझबूझ वाले समन्वयवादी दृष्टिकोण के नेता माने जाते हैं। राजनीति में इन गुणों का बहुत महत्व होता है। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनते ही उनके सामने कई प्रकार की चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं।जिस प्रकार देश में एसआईआर को लेकर माहौल बन रहा है, उस पर उन्हें पार्टी की नीतियों के अनुसार कड़ा स्टैंड लेना पड़ेगा। आरएसएस इस समय हिंदू सम्मेलन कर लोगों के भीतर राष्ट्र जागरण का कार्य कर रहा है। उसे भी उन्हें संभालना होगा। आरएसएस के साथ समन्वय स्थापित करना और राष्ट्र प्रथम के आधार पर दोनों संगठनों को आगे लेकर बढ़ना समय की आवश्यकता है, साथ ही एक चुनौती भी है। इसके अतिरिक्त कई राज्यों में अभी चुनाव आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। इन सब में भाजपा की स्थिति को मजबूत करना भी श्री नितिन नवीन के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती उन्हें पश्चिम बंगाल में मिलने जा रही है। जहां से उन्हें ममता बनर्जी को सत्ता से उखाड़ना ही होगा। उनकी नियुक्ति के बारे में यह तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि 2029 के लोकसभा चुनाव भी उनके नेतृत्व में ही संपन्न होने हैं। इस प्रकार उस समय पार्टी को फिर से सत्ता में लाना भी उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। स्पष्ट है कि उन्हें काम तो करना ही है, चुनौतियों के समाधान भी खोजने हैं और पार्टी को हिंदुत्व की एकमात्र धर्म ध्वजवाहिका के रूप में सम्मान भी दिलाते रहना है।



( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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