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तुम मोहक वासंती बहार हो

तुम मोहक वासंती बहार हो

कुमार महेंद्र
अंग प्रत्यंग सौंदर्य निर्झर,
रग रग जोश उत्साह उमंग ।
हिय हिलोर आमोद प्रमोद,
प्रणय भाव मस्त मलंग ।
चाल ढाल अल्हड़ जवां ,
नैसर्गिक दुल्हन श्रृंगार हो ।
तुम मोहक वासंती बहार हो ।।


जीवन शैली अति मनहर,
हर कदम अग्र लक्ष्य ओर ।
तन मन पुनीत पावन ,
प्रति पल आनंद सराबोर ।
अंतःकरण नेह स्पंदन,
वैचारिकी अमिय धार हो ।
तुम मोहक वासंती बहार हो ।।


क्रोध घृणा नैराश्य विलोपन
सर्वत्र स्नेह प्रेम उजियारा ।
वंदन निज संस्कृति संस्कार,
संबंध पट अपनत्व पसारा ।
मृदुल मधुर भाव भंगिमा,
तृषा तृप्त अनुपम आधार हो ।
तुम मोहक वासंती बहार हो ।।


ज्ञान प्रज्ञान शीर्ष स्पंदन,
गीत संगीत मनभावन ।
ललित लास्य लोल तरंग,
राग रंग मुस्कान बिछावन ।
संवाद पटल माधुर्य सरिता,
मद मस्त यौवन उभार हो ।
तुम मोहक वासंती बहार हो ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)


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