औपचारिक हैं रिश्ते नाते, मत इन पर विश्वास करो,

औपचारिक हैं रिश्ते नाते, मत इन पर विश्वास करो,

सब अपनी उलझन उलझे, मत इन पर विश्वास करो।
जख्मों पर मरहम की बातें, ज़ख़्म कुरेदने आते हैं,
आकर दर्द सुनाते अपना, मत इन पर विश्वास करो।


करते हमदर्दी की बातें, मन में स्वार्थ छिपा होता,
कोई राज मिले घर का, मन में खोट छिपा होता।
बात करेंगे लम्बी चौड़ी, चाँद गगन से लाकर देंगे,
कैसे विश्वास करें इन पर,मन में पाप छिपा होता।


नहीं अकेला कोई जग में, तन्हाई तो साथ रहे,
दर्द अकेले कब आता है, बिछड़ी यादें साथ रहें।
तन्हाई में दर्द से ज्यादा, अपनों की यादें आती,
ख़ुशियाँ तो आनी जानी, दर्द का किस्सा साथ रहे।

अ कीर्ति वर्द्धन
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