ऑंसू और खामोशी
अरुण दिव्यांशछलक पड़ते हैं तब ये ऑंसू ,
जब हृदय हर्ष विभोर होता है ।
छा जाती है तब ये खामोशी ,
जब मन में छिपा चोर होता है ।।
मिलते ऑंसू और खामोशी ,
जब हृदय में ही गम होता है ।
छा जाती तब सर्वत्र खामोशी ,
जब चक्षु भी यह नम होता है ।।
छलक पड़ते हैं तब ये ऑंसू ,
जब हृदय में खुशियाॅं होती हैं ।
झुक जाते मस्तक जन जन के ,
चहुॅं ओर मायुसियाॕं होती हैं ।।
ऑंसू और खामोशियाॅं कहतीं ,
दर्दों के ऑंसू को बह जाने दो ।
आतुर हैं कुछ कहने को ऑंसू ,
छलककय उन्हें कह जाने दो ।।
बहुत बहुमूल्य होते हैं ऑंसू ,
गुमसुम हो सब कह जाते हैं ।
हर्ष में लबों पर आती है हॅंसी ,
गम की बातें सब सह जाते हैं ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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