युगों की विरासत: कला, संस्कृति और समाज का अंतर्संबंध
सत्येन्द्र कुमार पाठक
मानव सभ्यता का इतिहास केवल युद्धों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सूक्ष्म चेतना की यात्रा है जिसे हम 'कला' और 'संस्कृति' कहते हैं। आदिम गुफाओं के शैलचित्रों से लेकर आधुनिक डिजिटल स्क्रीन तक, कला ने व्यक्ति को समाज से जोड़ने और मानवीय मूल्यों को गढ़ने का काम किया है। यदि समाज एक शरीर है, तो संस्कृति उसकी आत्मा है और कला उसकी प्राणवायु। कला और संस्कृति:की परिभाषा से परे का संबंध में कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि यह आलोचनात्मक सोच और सहानुभूति विकसित करने का एक सशक्त उपकरण है। संस्कृति उन साझा मूल्यों और प्रथाओं का नाम है, जो व्यक्ति के जीवन को आकार देती हैं। जैसा कि विभिन्न समाजशास्त्रीय लेखों में स्पष्ट किया गया है, कला सामाजिक मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करती है और कार्रवाई को प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक कला (Public Art) गरीबी, अपराध या पर्यावरण जैसे गंभीर विषयों पर जागरूकता बढ़ा सकती है। चेतना और कला का विकास में भारतीय दर्शन के अनुसार, समय चार युगों के चक्र में घूमता है। इन युगों में कला की उत्पत्ति और समाज पर इसके प्रभाव को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है:।सतयुग (नाद और पूर्णता): इस युग में कला का स्वरूप 'ध्वनि' (नाद) और 'मौन' पर आधारित था। यहाँ कला का उद्देश्य केवल आत्म-साक्षात्कार था। वैज्ञानिक रूप से, यह उच्चतम मानवीय चेतना का युग था जहाँ समाज पूरी तरह से प्राकृतिक संतुलन में था।।त्रेतायुग (मर्यादा और आदर्श): जनसंख्या बढ़ने के साथ समाज को अनुशासन की आवश्यकता पड़ी। भगवान राम का जीवन और वाल्मीकि का काव्य इस युग की कला के स्तंभ बने। यहाँ स्थापत्य कला का उदय हुआ, जिसने 'नगर नियोजन' के वैज्ञानिक सिद्धांतों को जन्म दिया।।द्वापरयुग (विस्तार और उत्सव): भगवान कृष्ण की '64 कलाओं' ने इस युग को परिभाषित किया। संगीत, नृत्य और कूटनीति का मिश्रण द्वापर की विशेषता थी। यहाँ कला ने समाज को जटिलताओं के बीच 'उत्सव' मनाना सिखाया। द्वारका जैसे नगरों का निर्माण उस समय की उन्नत समुद्री इंजीनियरिंग का प्रमाण है।
कलियुग (पुनरुत्थान और तकनीक): वर्तमान में कला एक 'थेरेपी' और 'सामाजिक अस्त्र' बन गई है। तनावपूर्ण जीवन में शास्त्रीय संगीत और लोक कलाएं मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) के लिए संजीवनी का कार्य कर रही हैं।
: दिव्य और लोक धाराएं भारतीय कला परंपरा में कला को 'देवतादत्त' माना गया है । भगवान शिव (नटराज) को नृत्य का जनक माना जाता है, जिन्होंने सृजन और विनाश के संतुलन को 'तांडव' के माध्यम से व्यक्त किया। संगीत और वादन: की उत्पत्ति सामवेद से हुई। देवी सरस्वती और भरत मुनि (नाट्यशास्त्र के प्रणेता) ने इसे शास्त्रीय अनुशासन दिया।।लोक कला: का जनक कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा 'समाज' है। लोकगीत और लोक नृत्य सामूहिक श्रम, फसल की कटाई और ऋतुओं के उत्सव से उपजे हैं। ये मिट्टी की वह महक हैं जो 'जीयो और जीने दो' जैसे मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाती हैं। आधुनिक विज्ञान पुष्टि करता है कि कला और संस्कृति का व्यक्ति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। संगीत सुनने या चित्रकारी करने से मस्तिष्क में 'डोपामाइन' (खुशी का हार्मोन) और 'ऑक्सीटोसिन' (सामाजिक जुड़ाव का हार्मोन) का स्राव होता है। विश्व स्तर पर, यूनेस्को (UNESCO) जैसी संस्थाएं मानती हैं कि 'सांस्कृतिक समावेश' ही वैश्विक शांति की एकमात्र कुंजी है। भारत की राष्ट्रीय पहचान उसकी विविधता—संगीत, नृत्य, त्योहार और खान-पान—में ही निहित है। कला और संस्कृति सामाजिक व्यवस्था के पुनरुत्पादन के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। Samarthanam.org जैसे संस्थानों के अनुसार, शिक्षा में कला का समावेश बच्चों की व्यक्तिगत और शैक्षणिक सफलता के लिए अनिवार्य है। यह न केवल करियर निर्माण में मदद करती है, बल्कि एक संवेदनशील और जागरूक नागरिक भी बनाती है। कला और संस्कृति केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की आधारशिला हैं। सतयुग की शांति हो या कलियुग का कोलाहल, कला ने हमेशा मनुष्य को उसकी गरिमा बनाए रखने में मदद की है। समाज का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानें और कला के माध्यम से नवीन अनुसंधान करें।
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