बाल मन के चितेरे: भारतीय बाल साहित्य की गौरवशाली यात्रा
सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्रस्तावना: वह नींव जिस पर कल खड़ा है बाल साहित्य केवल कहानियों और कविताओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह वह खाद-पानी है जिससे किसी राष्ट्र के भविष्य का नागरिक आकार लेता है। बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य उनके कोमल मन को जीवन की सच्चाइयों से परिचित कराने का सबसे सशक्त माध्यम है। पंद्रहवीं शताब्दी से लेकर आज के डिजिटल युग तक, बाल साहित्य ने नैतिक मूल्यों, धार्मिक संदेशों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच अपना रास्ता बनाया है। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ को, जब 'एलिसा इन वंडरलैंड' और 'पीटर पैन' जैसे वैश्विक क्लासिक्स आए, इसे बाल साहित्य का 'स्वर्ण युग' कहा गया। भारत में भी, यह कालखंड बाल पत्रिकाओं के उदय का साक्षी बना। भारतीय बाल साहित्य की परंपरा विश्व में सबसे प्राचीन है। सतयुग, त्रेता और द्वापर में जब 'पुस्तक' भौतिक रूप में नहीं थी, तब ऋषियों के आश्रमों में मौखिक उपदेशों और कथाओं के माध्यम से ज्ञान का हस्तांतरण होता था। नारायण पंडित और विष्णु शर्मा द्वारा रचित 'पंचतंत्र' और 'हितोपदेश' ने पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर जो नीति शिक्षा दी, वह आज भी विश्वभर के प्रबंधन और व्यवहार विज्ञान का आधार है। पौराणिक कहानियों में भक्त ध्रुव का संकल्प, प्रहलाद की निडरता और नचिकेता की जिज्ञासा बच्चों को वह संस्कार देती है, जो उम्र भर उनके चरित्र का हिस्सा बने रहते है।
बचपन में मां द्वारा सुनाई गई कहानियां और लोरियां ही बच्चे का साहित्य से पहला परिचय कराती हैं। मां ही उसे साहस, त्याग और परिश्रम के गुण सिखाती है। वास्तव में, बाल साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। आधुनिक युग में चार्ल्स डार्विन और जॉन लॉक जैसे दार्शनिकों के प्रभाव ने बाल साहित्य को अधिक वैज्ञानिक और तर्कसंगत बनाया। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे और अरविन्द गुप्ता जैसे मनीषियों ने इसे 'राजा-रानी' के तिलिस्म से निकालकर प्रयोगशाला के प्रयोगों और अंतरिक्ष की यात्राओं तक पहुँचाया। भारतीय बाल साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाने में श्री के. शंकर पिल्लई का योगदान अविस्मरणीय है। १९५७ में स्थापित 'चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट' आज भी ५ से १६ वर्ष के बच्चों के लिए ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र ह पौराणिक कथाओं से लेकर आधुनिक विज्ञान और जासूसी उपन्यासों तक का भंडार है। भाषाई सेतु का कार्य सीबीटी ने हिंदी के अलावा असमिया, बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलुगु और पंजाबी सहित १० भाषाओं में सचित्र पुस्तकें प्रकाशित कर भाषाई दूरियां मिटा दी हैं। इसके परिसर में स्थित 'डॉ. राय मेमोरी चिल्ड्रन्स लाइब्रेरी' में ३०,००० से अधिक पुस्तकें बच्चों के बौद्धिक विकास की गवाह हैं । हिंदी बाल पत्रकारिता के बिना बाल साहित्य का इतिहास अधूरा है।
: १८७४ में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की 'बाल बोधिनी' से शुरू हुआ सफर 'बालसखा' (१९१७) के माध्यम से शिखर पर पहुँचा। बालक , चंपक, नंदन, बालहंस, बाल भारती और नन्हें सम्राट जैसी पत्रिकाओं ने पीढ़ियों को संस्कारित किया है। 'पंजाब केसरी', 'नवभारत टाइम्स' और 'हिंदुस्तान' प्रभात खबर जैसे पत्रों ने 'बालकों का कोना' जैसे स्तंभों के माध्यम से बच्चों की रचनात्मकता को मंच प्रदान किया। दिल्ली में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का N.I.E. सेंटर आज भी स्कूली गतिविधियों को रंगीन और सूचनाप्रद ढंग से प्रस्तुत कर रहा है। बाल साहित्य को केवल 'हल्की-फुल्की' विधा मानने की भूल को सुधारने का काम सिरसा (हरियाणा) और बनौली (बिहार) , बालाघाट की बाल साहित्य के संस्थानों ने किया है। इन संस्थानों ने बाल साहित्य को शोध का विषय बनाया। मातेश्वरी विद्यादेवी बाल साहित्य शोध संस्थान: इस संस्थान ने बाल साहित्य की आलोचना को प्रतिष्ठित किया। यहाँ से प्रकाशित शोध-पत्रों ने लेखकों को बाल मनोविज्ञान की गहराइयों को समझने में मदद की। अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलन: सिरसा में होने वाले इन सम्मेलनों ने देशभर के साहित्यकारों को एक मंच पर लाकर 'बाल साहित्य का राष्ट्रीय नेटवर्क' खड़ा किया। हिंदी बाल साहित्य शोध संस्थान: दरभंगा का क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से 'बालक' पत्रिका की कर्मभूमि रहा है। बनौली स्थित इस संस्थान ने दुर्लभ पुरानी पत्रिकाओं को सहेजने और उन पर शोध करने का जो कार्य किया है, वह ऐतिहासिक है। डॉ. राष्ट्रबंधु जैसे विद्वानों के मार्गदर्शन में यहाँ बाल साहित्य की समीक्षा के नए आयाम स्थापित हुए । भारतीय राज्यों में बाल साहित्य की अपनी-अपनी खुशबू है: बंगाल का साहित्य 'संदेश' पत्रिका और सत्यजीत रे के 'फेलुदा' जैसे पात्रों के कारण बौद्धिक और रहस्यात्मक है। मध्य प्रदेश का एकलव्य' संस्था की पत्रिका 'चकमक' ने बच्चों में वैज्ञानिक चेतना और 'करके सीखने' की प्रवृत्ति विकसित की। राजस्थान में बालहंस' के माध्यम से यहाँ लोक संस्कृति और कला को बाल पाठकों तक पहुँचाया गया। तमिलनाडु: में साहित्य में गणितीय तर्क और शास्त्रीय गहराई का अनूठा मेल मिलता है।
आधुनिक बाल साहित्य के प्रणेता डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने ३०० से अधिक पुस्तकें लिखकर इस विधा को गंभीरता प्रदान की। उन्हें साहित्य अकादमी ने २०११ में उनके समग्र योगदान के लिए सम्मानित किया। वहीं, श्री जयप्रकाश भारती को हिंदी बाल साहित्य का 'युग प्रवर्तक' माना जाता है। विज्ञान के क्षेत्र में अरविन्द गुप्ता का नाम अग्रणी है। उन्होंने 'कबाड़ से जुगाड़' के माध्यम से विज्ञान को खिलौनों में बदला। उनकी वेबसाइट पर ४०० से अधिक पुस्तकें पीडीएफ के रूप में उपलब्ध हैं, जो शिक्षा को बोझ नहीं, बल्कि खेल बनाती हैं। बाल साहित्य की आलोचना के क्षेत्र में निरंकार देव सेवक, प्रकाश मनु, डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' और शकुंतला कालरा जैसे विद्वानों ने उल्लेखनीय कार्य किया है। उन्होंने यह स्थापित किया कि बच्चों के लिए लिखना "मक्खन की तरह निर्मल मन" पर उतरने जैसा है, जिसके लिए लेखक को स्वयं बच्चा बनना पड़ता है।
भविष्य की राह में आज जब बालक कल का नागरिक बनने की राह पर है, उसे अंतरिक्ष की यात्राएं करनी हैं और दूसरे ग्रहों पर जाना है, तब बाल साहित्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। लेखक को आज के जीवन की सच्चाइयों से बच्चों को परिचित कराना होगा ताकि वे जीवन के संघर्षों से जूझ सकें। समर्पण, सद्भावना और भारतीय संस्कृति के तत्व बच्चों के मानस पटल पर अंकित करना ही बाल साहित्य का असली उद्देश्य है। हमें डिजिटल स्क्रीन की भीड़ में बच्चों के हाथों में फिर से महकती हुई किताबें और पत्रिकाएं थमानी होंगी। सिरसा से बनौली तक फैले शोध संस्थान और दिल्ली के प्रकाशन गृह इस दिशा में प्रकाश स्तंभ की तरह कार्य कर रहे हैं। बाल साहित्य की यह गंगा युगों-युगों तक इसी प्रकार प्रवाहित होती रहनी चाहिए।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com