"अर्थों से परे जीवन की स्वीकृति"
पंकज शर्मा
मित्रों जीवन देह का एक निर्विवाद सत्य है—श्वास का आना-जाना, नाड़ी की गति, क्षणों का प्रवाह। हम इसी सरल यथार्थ पर अर्थों की जटिल संरचनाएँ खड़ी कर लेते हैं एवं उन्हें ही जीवन का प्रयोजन मान बैठते हैं। परिणामस्वरूप सहज अनुभूति बोझ बन जाती है, एवं अस्तित्व प्रश्नों में उलझकर थकने लगता है।
जब हम अर्थों की इस गलतफ़हमी से मुक्त होते हैं, तब जीवन अपने मूल स्वरूप में प्रकट होता है—निर्विकार, स्वीकृत, शांत। यही बोध आध्यात्मिक स्वतंत्रता की पहली सीढ़ी है, जहाँ जीना किसी लक्ष्य की दौड़ नहीं, बल्कि वर्तमान की पूर्ण स्वीकृति बन जाता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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