माघ मेला क्षेत्र में शंकराचार्य विवाद: सनातन परंपरा, संत सम्मान और धर्म की क्षति पर उठते गंभीर प्रश्न

माघ मेला क्षेत्र में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर उठे विवाद ने न केवल धार्मिक जगत, बल्कि शासन-प्रशासन और सनातन समाज को भी गहन मंथन के लिए विवश कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि स्वामी जी शंकराचार्य हैं या नहीं, बल्कि इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि यह विवाद वर्ष 2023, 2024 या 2025 में क्यों नहीं उठाया गया और ठीक माघ मेला जैसे पवित्र आयोजन के दौरान ही इसे उछालने का उद्देश्य क्या है।
सनातन परंपरा के अनुसार, वह व्यक्ति जिसने बाल्यकाल में घर-परिवार का त्याग कर संन्यास दीक्षा ग्रहण की हो, वेद-शास्त्र-पुराणों का गहन अध्ययन किया हो और जिसने जीवन पर्यंत राष्ट्र, धर्म और समाज की रक्षा के लिए संघर्ष किया हो, वह साधारण नहीं हो सकता। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का जीवन इसी परंपरा का प्रतीक बताया जा रहा है। गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर उन्होंने समय-समय पर सत्ताधारी दलों के दरवाजे खटखटाए, लाठियां खाईं, विरोध झेला, लेकिन अपने संकल्प से पीछे नहीं हटे।
विवाद खड़ा करने वालों पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए संत समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि शंकराचार्य होने या न होने का प्रश्न इतना ही गंभीर था, तो यह माघ मेला से पहले क्यों नहीं उठाया गया। माघ मेला क्षेत्र में लाखों श्रद्धालु, साधु-संत और अखाड़े एकत्र होते हैं, ऐसे में इस प्रकार का विवाद सनातन एकता को कमजोर करने वाला सिद्ध हो सकता है।
स्वामी जी को लेकर राजनीतिक आरोप भी लगाए जा रहे हैं। कहीं उन्हें कांग्रेसी बताया जा रहा है, तो कहीं किसी अन्य राजनीतिक दल का समर्थक। जबकि तथ्य यह है कि जिन स्वामी जी को कांग्रेसी कहा जा रहा है, उन्होंने स्वयं कांग्रेस के सर्वोच्च नेता राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत घोषित किया है। वहीं, जिन्हें अखिलेश यादव का समर्थक बताया जा रहा है, उन्हीं स्वामी जी ने अखिलेश की पार्टी को “नमाजवादी पार्टी” कहकर तीखी आलोचना की है। ऐसे में राजनीतिक चश्मे से किसी संन्यासी को देखने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
धार्मिक चिंतकों का मानना है कि सत्ता और शासन का दायित्व हमेशा संतों का सम्मान करना रहा है और आगे भी रहना चाहिए। संत समाज सनातन धर्म की रीढ़ है। माघ मेला कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाएगा, श्रद्धालु अपने घर लौट जाएंगे और स्वामी जी भी अपने मठ चले जाएंगे, लेकिन यदि इस अवधि में सनातन धर्म की छवि को ठेस पहुंची, तो उसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
सबसे चिंताजनक पहलू यह बताया जा रहा है कि स्वयं को हिंदू कहने वाले कुछ लोग, जिनके जीवन में न तो यज्ञोपवीत, न चंदन, न शिखा, न संध्या-वंदन और न ही सात्विक आहार का अनुशासन है, वही स्वामी जी को “कालनेमि” या “शुक्राचार्य” जैसे अपमानजनक संबोधनों से पुकार रहे हैं। यह प्रवृत्ति सनातन संस्कृति की आत्मा पर चोट के समान मानी जा रही है।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज हम किसी विधर्मी को हिंदू धर्म में सम्मिलित कर गर्व महसूस करते हैं, लेकिन जब सनातन परंपरा का एक संन्यासी माघ मेला क्षेत्र में धर्म की रक्षा और परंपराओं की बात करता है, तो उसी पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
धर्माचार्यों ने चेतावनी दी कि माघ मेला क्षेत्र का परिणाम चाहे जो भी हो, सबसे बड़ी क्षति सनातन धर्म की हो रही है। रामचरितमानस की चौपाई का स्मरण कराते हुए कहा गया—
“जब जब होइ धर्म कै हानी। बाढ़हि असुर अधम अभिमानी॥
तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा। हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा॥”
अंत में संत समाज और धर्मप्रेमियों की ओर से अपील की गई कि किसी भी प्रकार के अभियान, विवाद या राजनीतिक दुष्प्रचार का त्याग किया जाए और संतों का सम्मान सुनिश्चित किया जाए। यही सनातन परंपरा की रक्षा का मार्ग है।
जय श्री मन्नारायण
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