(मकर संक्रांति _2026)
सविता सरित हुई,अब उत्तरायण की ओर
कुमार महेंद्रसृष्टि पटल देवलोक प्रभा,
सर्वत्र शुभ मंगल प्रवाह ।
जन पटल नव चेतना स्फूर्त,
आशा उत्साह उमंग अथाह ।
प्रकृति छटा अति मनोहारी,
जीवन हर्ष आनंद सराबोर ।
सविता सरित हुई,अब उत्तरायण की ओर ।।
उत्सव त्योहार परिणय सह,
शुभ काम काज श्री गणेश ।
धर्म आस्था भक्ति परम बिंदु,
नव श्रृंगार सर सरिता भावेश ।
पुनीत पावन स्नान काज,
लोक दान पुण्य अनन्य छोर ।
सविता सरित हुई,अब उत्तरायण की ओर ।।
सूर्य धनु प्रस्थान मकर प्रवेश,
धर्म आस्था स्वरूप सजल ।
बेला मकर संक्रांति पोंगल,
जप तप अर्पण तर्पण सकल ।
नभ शोभित रंग बिरंगी पतंगें,
परिवेश वो काटा मारा शोर ।
सविता सरित हुई,अब उत्तरायण की ओर ।।
प्रकृति अंतर यौवन उभार,
जन अठखेलियां मस्त मलंग ।
गुड़ तिल मिश्रित मिष्ठान वितरण,
उर हिलोर मानव सेवा रंग ।
असीम कामना सुख समृद्धि,
खुशहाली आच्छादित जीवन भोर ।
सविता सरित हुई,अब उत्तरायण की ओर ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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