हठधर्मिता संतत्व का आभूषण नहीं

पीठाधीश्वर स्वामी श्यामानंद जी महाराज के वक्तव्य के आलोक में
सनातन परंपरा में संत का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है। संत वह होता है जो सहनशीलता, विवेक, करुणा और समन्वय का प्रतीक हो। किंतु जब संतत्व के नाम पर हठधर्मिता, टकराव और अहं का प्रदर्शन होने लगे, तब न केवल परंपरा आहत होती है, बल्कि समाज में भ्रम और पीड़ा भी उत्पन्न होती है। अंतर्राष्ट्रीय संत बौद्धिक मंच के राष्ट्रीय महासचिव (भारत), पीठाधीश्वर एवं वरिष्ठ पत्रकार स्वामी श्यामानंद जी महाराज ने प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर पर हुए हमले और उससे जुड़े घटनाक्रम पर अपनी स्पष्ट और संतुलित राय व्यक्त करते हुए इसी चिंता को रेखांकित किया है।
स्वामी श्यामानंद जी महाराज ने कहा कि प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर पर हुआ हमला निस्संदेह सनातन धर्म पर घातक प्रहार है। यह न केवल निंदनीय है, बल्कि किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने मांग की कि इस मामले में प्रयागराज पुलिस को त्वरित कार्रवाई करते हुए दोषियों को अविलंब गिरफ्तार करना चाहिए, ताकि धर्म की आड़ में फैलाए जा रहे उपद्रव पर रोक लग सके।
साथ ही, स्वामी श्यामानंद जी ने अविमुक्तेश्वरानंद और प्रयागराज मेला प्रशासन के बीच हुए विवाद पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम में संत धर्म के मूल्यों को भूलकर हठधर्मिता को प्रधानता दी गई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद को चाहिए था कि वे अपनी हठधर्मिता त्यागकर संगम स्नान कर इस विवाद को यहीं समाप्त कर देते। विशेष रूप से तब, जब उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इस प्रकरण पर पहले ही खेद प्रकट करते हुए उनसे क्षमा प्रार्थना कर ली थी।
स्वामी श्यामानंद जी ने प्रयागराज प्रशासन के पक्ष को भी मजबूती से रखा। उन्होंने कहा कि संभावित भगदड़ की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने आम श्रद्धालुओं की जान बचाने के लिए जो निर्णय लिए, वह पूरी तरह कर्तव्यनिष्ठ और जनहित में थे। प्रतिबंधित क्षेत्र में सैकड़ों समर्थकों के साथ प्रवेश से रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी थी, जिसे उसने मुस्तैदी से निभाया। किंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा 500 मीटर पैदल चलने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेना ही पूरे विवाद की जड़ बन गया। यही कारण है कि यह मुद्दा आज संपूर्ण विश्व में सनातन प्रेमियों के लिए पीड़ादायक विषय बन गया है।
पीठाधीश्वर स्वामी श्यामानंद जी महाराज ने दो टूक कहा कि इस प्रकरण में न तो संत धर्म का पालन हुआ और न ही हजारों लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई। जब स्वयं राज्य सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधि द्वारा क्षमा प्रार्थना की जा चुकी हो, तब भी विवाद को तूल देना और उसे निजी या राजनीतिक लाभ का माध्यम बनाना न तो धर्मसंगत है और न ही न्यायसंगत।
उन्होंने शिविर पर रात में हुए हंगामे और शोर-शराबे को भी धर्मविरुद्ध बताया। उनका कहना है कि सनातन धर्म ऐसी उग्र और अराजक गतिविधियों की अनुमति नहीं देता। स्वामी श्यामानंद जी ने आशंका जताई कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बदनाम करने के उद्देश्य से कुछ उपद्रवियों ने उनका नाम लिया। उन्होंने इसकी तुलना बंगाल की पुरानी राजनीति से की, जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को बदनाम करने के लिए विरोधी शक्तियां उनके नाम के नारे लगाकर धरना-प्रदर्शन किया करती थीं।
अपने वक्तव्य में स्वामी श्यामानंद जी महाराज ने बसंत पंचमी के दिन शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद द्वारा किए गए संगम स्नान का उदाहरण भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि शंकराचार्य जी ने प्रशासन की बात को स्वीकार किया और चलने में असमर्थ होने के कारण त्रिचक्र वाहन (ट्राई साइकिल) से घाट तक जाकर स्नान किया। यह आचरण संत परंपरा की मर्यादा, विनम्रता और समन्वय का आदर्श उदाहरण है।अंत में स्वामी श्यामानंद जी महाराज ने आग्रह किया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को तत्काल अपना आंदोलन समाप्त करना चाहिए और संत-समाज एवं सनातन धर्म की गरिमा को मखौल बनाए जाने से रोकना चाहिए। संतों की भूमिका समाज को जोड़ने की होती है, तोड़ने की नहीं। हठधर्मिता नहीं, बल्कि विवेक, संयम और समरसता ही संत की सच्ची पहचान है।
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