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श्रीसूर्याष्टकम्

श्रीसूर्याष्टकम्

रचना --- डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
जय हो जय हो सूर्य नारायण,
जग के दीप महान।
अज्ञान तिमिर हर लीजिए,
ज्ञान प्रभा भगवान॥
अंतरा १
आदिदेव भास्कर प्रभु,
करुणा के भंडार।
प्रणाम प्रभाकर सदा,
चरण में बारंबार॥
जय हो जय हो सूर्य नारायण..….
अंतरा २
सप्त अश्वन रथ साजे प्रभु,
कश्यप सुत बलवान।
श्वेत कमल कर शोभिते,
तेजोमय भगवान॥
जय हो जय हो सूर्य नारायण…....
अंतरा ३
लोहित रथ पर विराजते,
जग के पिता महान।
महापाप हरने वाले,
दीनन के भगवान॥
जय हो जय हो सूर्य नारायण…...
अंतरा ४
ब्रह्मा विष्णु शिव रूप हो,
त्रिगुणों के आधार।
वीर, प्रचंड, प्रकाशमय,
करुणा के सागर पार॥
जय हो जय हो सूर्य नारायण…....
अंतरा ५
तेज पुंज प्रभु आप हो,
वायु गगन सम रूप।
सकल लोक के स्वामी हो,
जग जीवन अनूप॥
जय हो जय हो सूर्य नारायण…...
अंतरा ६
बन्धूक पुष्प सम लाल तन,
हार कुण्डल धार।
एकचक्रधर देव हो,
करहु भव से पार॥
जय हो जय हो सूर्य नारायण…...
अंतरा ७
जगत रचयिता आप हो,
तेज दीप अविराम।
पाप नाश कर दीजिए,
करुणा धाम प्रणाम॥
जय हो जय हो सूर्य नारायण…...
अंतरा ८
ज्ञान विज्ञान मोक्ष दाता,
जग के नाथ दयाल।
शरणागत की लाज रखो,
दीन जन प्रतिपाल॥


जय हो जय हो सूर्य नारायण,
जग के दीप महान।
अज्ञान तिमिर हर दीजिए,
ज्ञान प्रभा भगवान॥ २५.०१.२०२६
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