स्मृतियों के गलियारे से ममता का काव्य है माँ तेरे जाने के बाद

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय वांग्मय में माँ को 'अंबिका', 'जननी' और 'धात्री' जैसे गरिमामयी संबोधनों से अलंकृत किया गया है। लेकिन जब वही आधार-स्तंभ ढह जाता है, तो शेष रह जाती है एक अतल शून्यता। डॉ. संगीता सागर का सद्य प्रकाशित काव्य संकलन 'माँ तेरे जाने के बाद' इसी शून्यता को संवेदना के शब्दों से भरने का एक श्लाघनीय प्रयास है। यह संकलन केवल एक बेटी का विलाप नहीं, बल्कि मातृ-वियोग से उपजी उस वैराग्यमयी करुणा का दस्तावेज़ है, जो पाठक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। संवेदना का यथार्थ और अनुभूतियों की समृद्धि संकलन की सबसे बड़ी शक्ति इसकी प्रामाणिकता है। यहाँ माँ का कोई आदर्शवादी या काल्पनिक चित्रण मात्र नहीं है, बल्कि उस 'यथार्थ संवेदना' का संस्पर्श है जो अस्पताल की सफेद चादरों से लेकर घर के सूने आँगन तक फैली हुई है। संकलन की 51 कविताओं में अनुभूति, सहानुभूति और प्रेम का जो त्रिकोण निर्मित होता है, वह डॉ. सागर की काव्य-चेतना को एक नई ऊंचाई प्रदान करता है। पुस्तक में मुख्य रूप से उन कविताओं का उल्लेख अनिवार्य है जो हृदय की गहराइयों को छूती हैं। 'अस्पताल में एक रात' और 'माँ की अंतिम साँस' जैसी रचनाएँ उस मर्मांतक पीड़ा को स्वर देती हैं, जहाँ एक संतान अपनी नियति और ईश्वर के क्रूर निर्णय के सामने असहाय खड़ी होती है। अस्पताल की मशीनों का शोर और माँ की मंद पड़ती धड़कनों के बीच का जो द्वंद्व कवयित्री ने चित्रित किया है, वह पाठकों की आँखों में नमी छोड़ जाता है। लोक-संस्कृति और अम्मां का आत्मीय स्वरूप में डॉ. सागर ने अपनी कविताओं में 'माँ' को केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक संस्कृति के रूप में प्रतिस्थापित किया है। 'अम्मां' और 'वट सावित्री' जैसी कविताएँ इस संकलन के लोक-पक्ष को पुष्ट करती हैं।वट सावित्री: यह कविता भारतीय स्त्री के उस अक्षय विश्वास का प्रतीक है जो मृत्यु के देवता से भी अपने सुहाग और परिवार की रक्षा के लिए लड़ जाती है। कवयित्री ने बरगद के वृक्ष की विशालता और माँ की ममता में जो साम्य स्थापित किया है, वह अद्भुत है।
अम्मां: यहाँ 'अम्मां' शब्द का चयन उस ग्रामीण और आंचलिक संस्कृति की याद दिलाता है जहाँ संबंधों में औपचारिकता नहीं, बल्कि मिट्टी की सोंधी खुशबू और अपार अधिकारबोध होता था। विवेक और प्रेरणा का समावेश की समीक्ष्य कृति की एक विशिष्टता यह है कि यह केवल विरह-काव्य बनकर नहीं रह जाती। इसमें 'विवेक' का तत्व अत्यंत प्रबल है। कवयित्री मानती हैं कि माँ का जाना भौतिक है, किंतु उनके द्वारा रोपे गए मूल्य और संस्कार पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। कविता 'माँ तुम नहीं थी' में यह अहसास कराया गया है कि भौतिक रूप से अनुपस्थित होकर भी माँ एक सूक्ष्म साये की तरह हर संकट में मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है। डॉ. सागर की लेखनी में जो सरलता है, वही इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है। उन्होंने क्लिष्ट तत्सम शब्दों के स्थान पर उन बोलियों और संवेदनाओं को चुना है जो आम जनमानस के हृदय की भाषा है। 'बहुत याद आती हो माँ'—यह पंक्ति किसी कविता का शीर्षक मात्र नहीं, बल्कि इस पूरे संकलन की 'अंतर्ध्वनि' है। साहित्यिक शिल्प और भाषा-सौष्ठव शिल्प की दृष्टि से देखा जाए तो डॉ. संगीता सागर की कविताएँ मुक्त छंद की सहजता को अपनाती हैं। यहाँ अलंकारों का बोझ नहीं है, बल्कि भावों का अनर्गल प्रवाह है। बिम्ब-विधान अत्यंत सजीव है—चाहे वह अस्पताल का गलियारा हो, सूना रसोईघर हो या पूजा का वह स्थान जहाँ माँ की तस्वीर अब केवल यादों का हिस्सा है। कवयित्री ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि श्रेष्ठ साहित्य वही है जो निजी पीड़ा को 'परकाया प्रवेश' के माध्यम से वैश्विक पीड़ा बना दे। आज के उपभोक्तावादी युग में, जहाँ संबंध अपनी गर्माहट खो रहे हैं, यह संकलन हमें अपनी जड़ों, अपनी माँ और अपनी जड़-संस्कृति की ओर लौटने का मर्मस्पर्शी निमंत्रण देता है। 'माँ तेरे जाने के बाद' डॉ. संगीता सागर के रचना-संसार की एक कालजयी कृति कही जा सकती है। इसमें संवेदना की समृद्धि भी है और स्मृतियों का पवित्र उत्सव भी। यह काव्य-संकलन उन सभी संतानों के लिए एक संजीवनी की तरह है जो विछोह की अग्नि में जल रहे हैं। डॉ. सागर ने अपनी माँ को जो काव्यात्मक विदाई दी है, वह वास्तव में उन्हें शब्दों के माध्यम से अमर कर देने की एक सफल चेष्टा है। यह संकलन आने वाले समय में मातृ-काव्य परंपरा में एक मील का पत्थर साबित होगा, जो पीढ़ियों को ममता, त्याग और विवेक का पाठ पढ़ाता रहेगा।
पुस्तक का नाम - माँ तेरे जाने के बाद ( काव्य संग्रह )
कवयित्री - डॉ संगीता सागर
प्रकाशक - प्रतिभा प्रकाशन ,
केदारनाथ रोड , मुजफरपुर , बिहार ।
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