सांस्कृतिक चेतना के पुरोधा: पं. राधेश्याम कथावाचक और उनकी नारी दृष्टि
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय रंगमंच और साहित्य के आकाश में पंडित राधेश्याम कथावाचक (1890-1963) एक ऐसे नक्षत्र रहे हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से पौराणिक पात्रों को आधुनिक समाज का दर्पण बना दिया। एक दौर था जब पारसी थिएटर का बोलबाला था और संवादों में केवल मनोरंजन प्रधान था, तब बरेली की धरती से उठे इस साहित्यकार ने अपनी ओजस्वी वाणी और 'राधेश्याम रामायण' की चौपाइयों से जन-मानस में क्रांति फूंक दी। उनके साहित्य का सबसे उज्ज्वल पक्ष है— उनकी नारी दृष्टि। उन्होंने नारी को केवल पौराणिक सांचों में नहीं ढाला, बल्कि उसे सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना की मशाल बनाकर प्रस्तुत किया।
दुर्गा और भवानी का आधुनिक अवतार में राधेश्याम जी के साहित्य में नारी केवल एक 'पात्र' नहीं, बल्कि 'शक्ति' का पर्याय है। जब वे लिखते हैं— “नारी को दुर्बल मत मानो, वह दुर्गा और भवानी है”—तो वे सदियों से थोपी गई अबला की छवि को ध्वस्त कर देते हैं। उनके नाटकों में सीता, सावित्री और दमयंती जैसे पात्र केवल दुख सहने के लिए नहीं हैं, बल्कि वे अन्याय के विरुद्ध अडिग खड़े होने वाले चरित्र हैं। उनके अनुसार नारी ईश्वर की वह अद्भुत 'माया' है जो सृजन का आधार है। समाज सुधार की प्रखर ध्वनि में राधेश्याम कथावाचक उस युग के प्रतिनिधि थे जहाँ समाज रूढ़ियों की जकड़न में था। उन्होंने अपने नाटकों और कथाओं को 'स्त्री शिक्षा' और 'विधवा विवाह' जैसे गंभीर मुद्दों से जोड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि जिस समाज में नारी शिक्षित नहीं होगी, वह राष्ट्र कभी उन्नति नहीं कर सकता। उनके नाटकों को देखने के लिए तत्कालीन समय में संभ्रांत परिवारों की महिलाओं का उमड़ना इस बात का प्रमाण था कि उनके साहित्य ने महिलाओं के भीतर एक नया आत्मविश्वास पैदा किया था। नर की सहयात्री के लिए एक नया जीवन दर्शन का अक्सर साहित्य में नारी को पुरुष के पीछे चलने वाली छाया माना गया, लेकिन राधेश्याम जी ने उसे 'सहयात्री' का सम्मानजनक स्थान दिया। वे नारी की अनुकूलन क्षमता के प्रशंसक थे। वे कहते थे कि नारी का मायके से विदा होकर नए घर को अपना लेना और वहां खुशियां बिखेरना उसके मानसिक बल का प्रतीक है।
"नारी है नर की सहयात्री, सुख-दुख दोनों मिल गाते हैं। परिवार की नौका को दोनों, मिलकर ही पार लगाते है। राधेश्याम जी की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया। उनके नाटकों में जब नारी पात्र अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते थे, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी दासता के विरुद्ध लड़ रहे भारतीयों को प्रेरणा देता था। उन्होंने नारी को परिवार की आधारशिला माना, जो अपनी नैतिकता और संस्कारों से पूरे समाज को दिशा देती है। अपने जीवनकाल में 57 मौलिक पुस्तकें लिखने और 175 से अधिक पुस्तकों का संपादन करने वाले पंडित जी ने हर कृति में नारी के सम्मान को सर्वोपरि रखा। उनके नाटकों में नारी पात्रों की बहुलता यह दर्शाती है कि वे समाज के आधे हिस्से की भागीदारी के बिना किसी भी कथा को अधूरा मानते थे। उनके साहित्य ने नारी को केवल मंदिर की मूर्ति नहीं बनाया, बल्कि उसे समाज के समर में सक्रिय योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित किया। आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो पंडित राधेश्याम कथावाचक के विचार हमें एक संतुलित मार्ग दिखाते हैं। उनका साहित्य हमें सिखाता है कि आधुनिक होने का अर्थ अपनी जड़ों को भूलना नहीं है। उनकी नारी दृष्टि पारंपरिक मूल्यों और प्रगतिशील सोच का वह सेतु है, जिसकी आज के समाज को नितांत आवश्यकता है। वे वास्तव में हिंदी जन-जागरण के ऐसे शिल्पी थे जिन्होंने नारी के गौरव को साहित्य के सिंहासन पर बैठाया।
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