"रिक्त गृह का मौन"
पंकज शर्मादेहरी पर
धूप अब भी उतरती है,
पर पाँवों की आहट नहीं पहचानती;
चौखट
सदियों की तरह खड़ी है,
पर स्वागत की भाषा
भूल चुकी है।
आंगन में फैला आकाश
आज कुछ अधिक ही विस्तृत है—
जैसे किसी ने
उससे छाया छीन ली हो;
हवा घूमती है,
पर उसमें
संवाद नहीं बचा।
रसोई में
बर्तनों की खनक
स्मृति बन गई है;
आग जलती नहीं,
केवल ठंडी राख
दिन गिनती है
रातों के लिए।
दीवारें
अब ईंट नहीं रहीं,
वे प्रश्न बन गई हैं—
किसके सहारे
यह घर
अपने होने को
सिद्ध करे?
स्त्री की अनुपस्थिति
केवल शरीर का अभाव नहीं,
वह समय का ठहराव है;
घड़ी चलती है,
पर अर्थ
आगे नहीं बढ़ता।
यह घर
अब निवास नहीं,
एक लम्बा निर्वासन है;
जहाँ वस्तुएँ
एक-दूसरे से
परिचय खो बैठी हैं।
कभी जो हँसी
छत से टपकती थी,
वह अब
कोनों में जम गई है;
मौन इतना सघन है
कि शब्द
डरते हैं जन्म लेने से।
सम्पूर्ण घर बियाबान है—
क्योंकि स्त्री
केवल रहने वाली नहीं थी,
वह
घर का आत्मतत्त्व थी;
उसके बिना
छत भी
आकाश से अलग-थलग है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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