कैसे बताऊॅं मैं अपना परिचय
कैसे बताऊॅं मैं अपना परिचय ,
स्वयं को स्वयं जानता ही नहीं ।
बताता परिचय उर को अपने ,
पर उर इसको मानता ही नहीं ।।
मानता नहीं जब उर ही मुझे ,
तुझको परिचय क्या बतलाऊॅं ।
किस पर कर लूॅं एतबार मै ,
मन को अब कैसे समझाऊॅं ।।
मन को समझाना है खेल नहीं ,
मन उर में होता यह मेल नहीं ।
मन मस्तिष्क अति तीव्रगामी ,
उर है कच्छप उर है रेल नहीं ।।
उर ही पहचान न पाया मुझे ,
तू कैसे मुझे पहचान पाएगा ।
पहचान ही नहीं पाएगा मुझे ,
तो कैसे मुझे तू जान पाएगा ।।
इसे कहूॅं मैं समय का चक्कर ,
या इसको मैं अहंकार कह दूॅं ।
या कर लूॅं मैं अपराध स्वीकार ,
या इसे ही अधिकार कह दूॅं ।।
कर नहीं सकता यह रार मैं ,
तो क्या इसे ही प्यार कह दूॅं ।
कह दूॅं इसको अपनी मजबूरी ,
या इसे गले का हार कह दूॅं ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें|
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