घुसका घुसकी खेल
जय प्रकाश कुवंर
यह खेल ज्यादातर जाड़े के दिनों में गाँव देहात में खेला जाता रहा है। इस खेल में सभी उम्र के लोग एक साथ हिस्सा लेते रहे हैं। यह तो सबको मालूम है कि जाड़े के दिनों में ठंडी को भगाने के लिए शरीर पर गर्म कपड़े, कम्बल, रजाई आदि का प्रयोग किया जाता है। लेकिन इन सबसे अधिक हर वर्ग के और हर उम्र के लोगों के लिए सबसे ज्यादा गर्मी और सुकुन देने वाला अलाव अथवा घुर तापना होता रहा है। आज कल तो गाँव के अलावा शहरों में भी चौक चौराहों पर जाड़े के दौरान अलाव जलाया जाता है।
पहले जाड़े के दिनों में गाँव देहात के लोग अपने घर के आगे घास, फुस, लकड़ी तथा कचरा इकट्ठा करके उसे जलाते थे, जिसे अलाव अथवा घुर कहा जाता था। अलाव जलाया जाने के बाद गाँव घर के हर उम्र के लोग उसके इर्दगिर्द चारों तरफ गोलाई में बैठ कर घुर का आग तापते थे और कड़ाके की ठंडी से निजात पाते थे।
जब अलाव कमजोर या मधिम हो जाता था तब सभी लोग उसके करीब घुसक कर आ जाते थे। पुनः अलाव को तेज प्रज्वलित करने के लिए उसमें घासफुस अथवा लकड़ी डाला जाता था। ऐसा करने पर अलाव धधकने लगता था। तब सभी लोग पीछे घुसक कर अलाव से दूर हो जाते थे। इस तरह अलाव के नरम होने और प्रज्वलित होने का क्रम चलता रहता था और अलाव तापने वालों का आगे पीछे घुसका घुसकी का खेल जारी रहता था। इस प्रकार अलाव तापना ठंडी से आराम देने वाला भी होता था और सभी के लिए एक मनोरंजन भी था।
आज कल गाँव छोड़ लोगों के शहर की ओर पलायन कर जाने से गाँव देहात में भी यह अलाव अथवा घुर लगाने और तापने का सिलसिला कम हो गया है। साथ ही मनोरंजन तथा आपसी भाईचारा का खेल घुसका घुसकी भी लगभग समाप्त हो गया है।
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