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हिंदू एकता की सबसे बड़ी कीमत किसने चुकाई?

हिंदू एकता की सबसे बड़ी कीमत किसने चुकाई? 

डॉ राकेश दत्त मिश्र 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी OBC समाज से आते हैं—यह तथ्य है।
लेकिन इससे भी बड़ा तथ्य यह है कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में जाति नहीं, हिंदू पहचान निर्णायक बनी।
और इस हिंदू पहचान को सबसे ज़्यादा मजबूती सामान्य वर्ग ने दी।

सामान्य वर्ग ने कभी नहीं कहा—
“प्रधानमंत्री हमारी जाति का हो।”
उसने कहा—
“प्रधानमंत्री हिंदू अस्मिता का प्रतिनिधि हो।”

और इसी सोच के तहत सामान्य वर्ग ने तन-मन-धन सब कुछ न्योछावर कर दिया।

लेकिन सत्ता में आने के बाद क्या हुआ?

  • OBC आयोग को संवैधानिक दर्जा दे दिया गया।
    सवर्ण आयोग?
    उस पर तो बात करना भी पाप बना दिया गया।

  • NEET (AIQ) में 27% OBC आरक्षण लागू कर दिया गया।
    सामान्य वर्ग के लाखों मेधावी छात्रों के सपनों पर सीधा वार हुआ।
    फिर भी सड़कों पर आग नहीं लगी—क्योंकि सामान्य वर्ग ने राष्ट्र को प्राथमिकता दी।

  • 105वां संविधान संशोधन लाकर राज्यों को OBC सूची और आरक्षण तय करने का खुला लाइसेंस दे दिया गया।
    यह आरक्षण स्थायी करने का कानूनी जाल था।
    फिर भी सामान्य वर्ग चुप रहा।

  • OBC पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप बढ़ा दी गई—
    मेडिकल, इंजीनियरिंग, IIT–IIM तक सीधा लाभ।
    लेकिन सामान्य वर्ग के गरीब छात्र?
    उनके लिए सिर्फ “सब्र” और “हिंदू एकता” का उपदेश।

  • UPSC, SSC, NEET, JEE के लिए OBC छात्रों को फ्री कोचिंग
    सामान्य वर्ग का छात्र?
    उससे कहा गया—“मेहनत करो।”

अब UGC के काले नियम?

अब जब UGC ऐसे नियम लाती है, जिनसे सीधे तौर पर सामान्य वर्ग के छात्र निशाने पर आते हैं,
तो सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

आज पूछा जा रहा है—
“सामान्य वर्ग ने हिंदू एकता के लिए किया ही क्या है?”

यह सवाल नहीं, धोखा है।

सच यह है—

  • सामान्य वर्ग ने अपनी पहचान को दबाया
  • अपने अधिकारों को निगला
  • हर चुनाव में हिंदू एकता के नाम पर वोट दिया
  • हर चोट को “राष्ट्रहित” कहकर सह लिया

और बदले में क्या मिला?
संदेह, उपेक्षा और अपराधबोध।

अब चुप्पी अपराध होगी

अगर सामान्य वर्ग आज भी चुप रहा,
तो कल उसके बच्चों से कहा जाएगा—
“तुम्हारा हक़ कभी था ही नहीं।”

हिंदू एकता का मतलब यह नहीं कि
एक वर्ग बलि देता रहे और बाकी लाभ उठाते रहें।

दूसरों से सवाल पूछने से पहले,
सत्ता और नीति निर्माताओं को अपने गिरेबान में झाँकना होगा।

अब सवाल पूछना विद्रोह नहीं—
यह आत्मरक्षा है।

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