आरक्षण : -77 साल का प्रयोग और सरकार की बौद्धिक दिवालियापन.
डॉ राकेश दत्त मिश्र
आज़ादी के 77 साल बाद अगर कोई सरकार यह कहे कि “हम अब भी समाज को मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहे हैं”, तो यह स्वीकारोक्ति विकास की नहीं, असफलता की होती है।
क्योंकि अगर सात दशकों में भी किसी नीति का परिणाम नहीं दिखा, तो समस्या जनता में नहीं, नीति बनाने वालों की सोच में होती है।
भारत शायद दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ असफल प्रयोग को सफल योजना बताकर बार-बार दोहराया जाता है।
हर चुनाव में आरक्षण का प्रतिशत बढ़ता है, लेकिन स्कूलों की छतें गिरती हैं।
हर भाषण में सामाजिक न्याय गूँजता है, लेकिन अस्पतालों में स्ट्रेचर नहीं मिलते।
सरकारों ने आरक्षण को ऐसा पेश किया, मानो यह कोई चमत्कारी मशीन हो—जिसमें आदमी डाला और “काबिल नागरिक” बाहर निकला।
पर सच्चाई यह है कि
आरक्षण मौका देता है, माइंडसेट नहीं।
सीट देता है, स्किल नहीं।
और सर्टिफिकेट देता है, समझ नहीं।
और यहाँ सबसे बड़ा झूठ बोला गया।
झूठ नंबर 1 : आरक्षण ही विकास है
नहीं।
विकास शिक्षा से आता है,
शिक्षा गुणवत्ता से आती है,
और गुणवत्ता ईमानदार शासन से आती है।
लेकिन सरकारों ने आसान रास्ता चुना—
स्कूल सुधारने से आसान है कोटा बढ़ाना।
शिक्षक तैयार करने से आसान है भाषण देना।
और सिस्टम ठीक करने से आसान है जनता को बाँटना।
झूठ नंबर 2 : आरक्षण से बराबरी आ जाएगी
बराबरी तब आती है जब शुरुआत की रेखा एक जैसी हो।
लेकिन यहाँ हाल यह है कि
किसी बच्चे के हाथ में किताब नहीं,
दिमाग़ में सवाल नहीं,
और शिक्षक महीने में पाँच दिन स्कूल आता है—
और फिर सरकार कहती है, “लो आरक्षण, अब आगे बढ़ो।”
यह वैसा ही है जैसे किसी भूखे को तैरना सिखाए बिना समुद्र में धक्का दे देना और कहना—“अब बराबरी है।”
सरकार का पसंदीदा भ्रम
सरकार मानती है कि अगर किसी गधे के गले में रेस का नंबर डाल दो,
तो वह घोड़ा बन जाएगा।
अगर उसे स्टेडियम में खड़ा कर दो,
तो वह ओलंपिक जीत लेगा।
पर सच यह है—
घोड़ा बनाने के लिए नस्ल नहीं, प्रशिक्षण चाहिए।
और इंसान बनाने के लिए दिमाग़ पर काम करना पड़ता है।
आरक्षण देने से बुद्धि पैदा नहीं होती,
और बिना बुद्धि के कोई भी व्यवस्था खोखली रहती है।
77 साल का सबसे बड़ा सवाल
अगर आरक्षण इतना ही कारगर था,
तो आज भी—
- सरकारी स्कूलों के बच्चे अंग्रेज़ी से डरते क्यों हैं?
- डिग्रीधारी युवा नौकरी के लायक क्यों नहीं हैं?
- सरकारी दफ़्तरों में काम फाइलों के नीचे क्यों दबा है?
इसका जवाब कभी नहीं दिया गया,
क्योंकि जवाब देने के लिए आत्ममंथन चाहिए,
और सरकारें आत्ममंथन नहीं, आत्मप्रचार करती हैं।
असली समस्या आरक्षण नहीं है
असली समस्या है कि आरक्षण को
अंतिम समाधान मान लिया गया।
जबकि यह तो अस्थायी सहारा होना चाहिए था—
जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर बराबर न हो जाएँ।
लेकिन यहाँ तो सहारे को ही इमारत बना दिया गया,
और नींव—यानी शिक्षा—को भूल ही गए।
कटु सत्य
आज स्थिति यह है कि
आरक्षण से लाभ पाने वाला भी असंतुष्ट है,
और बिना आरक्षण वाला भी नाराज़।
मतलब नीति ऐसी कि
ना कोई पूरी तरह आगे बढ़ पाया,
ना कोई पीछे हट पाया—
सब बस सरकार के प्रयोग की प्रयोगशाला में बंद हैं।
निष्कर्ष (जो सरकार कभी नहीं कहेगी)
आरक्षण देने से गधा घोड़ा नहीं बनता।
उसके लिए दिमाग़ चाहिए,
दृष्टि चाहिए,
और सबसे ज़रूरी—ईमानदार नीयत चाहिए।
जब तक सरकारें
- शिक्षा को प्राथमिकता नहीं देंगी,
- योग्यता को मज़ाक बनाती रहेंगी,
- और वोट को विकास से ऊपर रखेंगी—
तब तक आरक्षण बढ़ेगा,
भाषण गूँजेंगे,
और देश पूछता रहेगा—
“77 साल बाद भी हम वहीं क्यों खड़े हैं?”
ताक़त प्रतिशत में नहीं होती,
ताक़त सोच में होती है।
और यही वह चीज़ है,
जिस पर आज सबसे ज़्यादा आरक्षण की ज़रूरत है।

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