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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति क्षरण का प्रतीत होता है - “अमेरिका फर्स्ट

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति क्षरण का प्रतीत होता है - “अमेरिका फर्स्ट

दिव्य रश्मि के उपसंपादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की खबर।

सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि युद्ध का अंत नहीं है, बल्कि युद्ध को टालने की कला है। इसी कला का नाम है “कूटनीति”। कूटनीति तलवार से नहीं चलती है, चलती है तो शब्दों से। यह शक्ति नहीं, संयम मांगती है। यह विजय नहीं, संतुलन खोजती है। डोनाल्ड ट्रंप के पहले वर्ष में इस कला को सबसे अधिक चोट पहुँची है।

ट्रंप मूलतः राजनेता नहीं हैं, बल्कि व्यवसायी हैं। उनकी दृष्टि में हर रिश्ता एक सौदा है। हर समझौता लाभ-हानि का खेल है और हर राष्ट्र ग्राहक या प्रतिद्वंद्वी है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंध सुपरमार्केट के अनुबंध नहीं होते हैं। यहाँ स्मृति होती है, इतिहास होता है और संवेदनाएँ होती हैं। ट्रंप ने इस जटिल संसार को एक कारोबारी मेज पर घसीट लाया है। उन्होंने मित्र देशों से कहा कि  “या तो ज्यादा भुगतान करो, या हमारी सुरक्षा भूल जाओ।” यह संवाद नहीं हो सकता है, बल्कि ब्लैकमेल हो सकता है। 

पहले वर्ष में ट्रंप की विदेश नीति का मुख्य स्वर रहा “धमकी”। व्यापार युद्ध की धमकी। सैन्य कार्रवाई की धमकी। संधियाँ तोड़ने की धमकी और आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी। किसी राष्ट्राध्यक्ष का धमकी देना नया नहीं है, लेकिन जब धमकी मुख्य भाषा बन जाए तो कूटनीति मरने लगती है। क्योंकि धमकी सुनने वाले को समझने का अवसर नहीं देती है, केवल डरने का विकल्प देती है और डर से स्थायी शांति नहीं बनती है।

संयुक्त राष्ट्र दुनिया का सबसे बड़ा संवाद मंच है। लेकिन ट्रंप के लिए यह मंच नहीं है, एक बोझ है। उन्होंने इसके निर्णयों को “बेमतलब” कहा। इसके खर्च को “अमेरिका पर भार” बताया और इसके प्रस्तावों को “अमेरिका विरोधी” कहा। उनके भाषणों में संयुक्त राष्ट्र एक वैश्विक संस्था नहीं है, एक परजीवी की तरह चित्रित हुआ है। जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश, सबसे बड़ी संस्था का उपहास करता है, तो संदेश साफ होता है कि “अब नियम नहीं, अब केवल ताकत चलेगी।” यह विश्व राजनीति के लिए खतरनाक मोड़ होता है।

ट्रंप की कूटनीति की सबसे विचित्र विशेषता रही है मित्र और शत्रु में अंतर मिट जाना। नाटो जैसे गठबंधन, जो दशकों से अमेरिका की रणनीतिक ढाल रहा है, उन्हें उन्होंने “बेमतलब” कहा। “महँगा सौदा” कहा और “अमेरिका को लूटने वाला तंत्र” कहा। यूरोप के नेता जो कभी वाशिंगटन की ओर नेतृत्व के लिए देखते थे, अब वहाँ से तिरस्कार और संदेह पाते हैं, जबकि मित्रता सम्मान से चलती है, व्यापारिक धमकी से नहीं।

कूटनीति का उद्देश्य होता है संघर्ष को संवाद में बदलना। ट्रंप की शैली में संवाद स्वयं संघर्ष बन जाता है। उनकी हर बैठक कैमरे के लिए प्रदर्शन। घरेलू राजनीति के लिए नाटक और वैश्विक मंच पर तनाव दिखता है। जब शब्द पुल नहीं बनाते, तो दीवार बनते हैं और युद्ध की संभावना अपने आप बढ़ जाती है। पहले वर्ष मे दुनिया ने यह महसूस किया है कि अब संकट आने पर वाशिंगटन शांतिदूत नहीं, बल्कि सर्वप्रथम उत्तेजक हो सकता है।

कुछ लोग कहते हैं कि “यह ट्रंप की शैली है, नीति नहीं।” लेकिन शैली जब सत्ता से जुड़ जाए, तो वह नीति बन जाती है। राष्ट्राध्यक्ष की भाषा केवल शब्द नहीं होती है बल्कि वह संकेत होती है सेनाओं के लिए, राजनयिकों के लिए और शत्रुओं के लिए भी। जब राष्ट्रपति हर बात को लड़ाई की तरह कहे, तो पूरी व्यवस्था लड़ाई की मुद्रा में आ जाती है।

कूटनीति केवल राजनीतिक उपकरण नहीं है, यह सभ्यता की रक्षा-कवच है। जब यह टूटती है, तो गलतफहमियाँ बढ़ती हैं। अफवाहें फैलती हैं। भावनाएँ भड़कती हैं और युद्ध आसान हो जाता है। ट्रंप का पहला वर्ष इस मौन क्षय का साक्षी है। शायद युद्ध अभी नहीं हुआ, लेकिन संवाद घायल हो चुका है और इतिहास सिखाता है कि जब संवाद मरता है, तो युद्ध केवल समय का प्रश्न रह जाता है।

दुनिया किसी एक राष्ट्र की जागीर नहीं है। यही बोध वैश्विक संस्थाओं की नींव है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व व्यापार संगठन, जलवायु समझौते, मानवाधिकार परिषद यह सब इस विचार से बने हैं कि शक्ति को नियमों में बाँधा जाए और टकराव को संवाद में बदला जाए। डोनाल्ड ट्रंप के पहले वर्ष में इन संस्थाओं के प्रति जो रवैया सामने आया है, वह केवल आलोचना नहीं था बल्कि वह अवमानना थी।

ट्रंप की दृष्टि में हर वैश्विक संस्था अमेरिका के रास्ते की रुकावट है। उसकी स्वतंत्रता पर अंकुश है और उसकी “महानता” में बाधा है। वे बार-बार कहते हैं कि “अमेरिका को किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं।” यह वाक्य सुनने में स्वाभिमान लगता है, पर व्यवहार में यह अराजकता का घोतक है। क्योंकि जब हर शक्तिशाली राष्ट्र यही कहने लगे कि “मैं किसी नियम को नहीं मानूँगा”  तो दुनिया जंगल बन जाती है।

महामारी जैसे वैश्विक संकट में डब्ल्यूएचओ की भूमिका समन्वय की होती है। लेकिन ट्रंप के लिए डब्ल्यूएचओ पक्षपाती है। अक्षम है और अमेरिका विरोधी है। उन्होंने इसके वित्त पोषण पर प्रश्न उठाए। इसकी रिपोर्टों को खारिज किया और इसे राजनीतिक मंच बना दिया। जब बीमारी सीमाएँ नहीं मानती, तब संस्थाओं से किनारा करना सिर्फ राजनीतिक जिद नहीं, मानवीय असंवेदनशीलता भी है। यह संदेश गया कि “अगर संकट मेरा नहीं,  तो मैं उसमें शामिल नहीं।”

जलवायु परिवर्तन कोई वैचारिक बहस नहीं है, यह अस्तित्व का प्रश्न है। लेकिन ट्रंप के लिए यह “अतिरंजना” है। यह “आर्थिक साजिश” है। यह “अमेरिका के उद्योगों पर हमला” है। उन्होंने पेरिस समझौते को कमजोर करने की दिशा में स्पष्ट संकेत दिए। यह केवल नीति परिवर्तन नहीं था।  यह भविष्य के प्रति उदासीनता का एलान था। दुनिया ने यह देखा कि आज का सबसे शक्तिशाली देश कल की सबसे बड़ी समस्या से मुँह मोड़ रहा है।

संस्थाएँ नियमों से चलती हैं। ट्रंप मनोदशा से। आज वे किसी संस्था को जरूरी मानते हैं, कल उसे बोझ कह देते हैं। आज कोई संधि “महान सौदा” होती है, कल वही “देश के साथ धोखा” बन जाती है। यह अस्थिरता केवल अमेरिका को नहीं, पूरी दुनिया को अनिश्चितता में डाल देती है। क्योंकि विश्व व्यवस्था स्थिरता पर टिकी होती है, सनक पर नहीं।

अमेरिका केवल एक राष्ट्र नहीं है, एक उदाहरण भी है। जब वह नियम तोड़ता है। संस्थाओं का उपहास करता है और केवल ताकत को आधार बनाता है। तो छोटे राष्ट्र भी सीखते हैं “अगर अमेरिका नहीं मानता, तो हम क्यों मानें?” यहीं से शुरू होता है वैश्विक अव्यवस्था का चक्र।

सभ्यता सहमति से बनती है। वर्चस्व डर से नहीं। ट्रंप की नीति सभ्यता से नहीं, वर्चस्व से प्रेरित दिखती है। उनका संदेश सरल है कि “या तो मेरी शर्तें मानो, या मेरे रास्ते से हट जाओ।” पर इतिहास सिखाता है कि डर से बना साम्राज्य लंबा नहीं चलता है और सहमति से बनी व्यवस्था ही टिकती है।

पहले वर्ष ने दुनिया को यह संकेत दिया है कि आने वाले समय में वैश्विक संस्थाएँ और अधिक दबाव में होगी या तो वे शक्ति के आगे झुकेगी या अप्रासंगिक हो जाएँगी। दोनों ही स्थितियाँ दुनिया के लिए खतरनाक हैं। क्योंकि संस्थाओं के बिना दुनिया केवल राष्ट्रों का समूह नहीं, राष्ट्रों का रणक्षेत्र बन जाती है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति सिर्फ मित्र और शत्रु का खेल नहीं है। यह संतुलन का शिल्प है। महाशक्ति का काम होता है मित्रों को भरोसा देना और शत्रुओं को सीमा में रखना। डोनाल्ड ट्रंप के पहले वर्ष में यह संतुलन डगमगाता दिखाई दिया है।

अमेरिका के परंपरागत मित्र यूरोप, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया देश दशकों से वाशिंगटन को रणनीतिक धुरी मानते आए हैं। लेकिन ट्रंप की भाषा में वे “अपर्याप्त योगदानकर्ता” हैं। “अमेरिका पर निर्भर बोझ” हैं। “फायदा उठाने वाले साथी” हैं। जब मित्रता को लेन-देन के तराजू पर तौला जाए, तो भरोसा पहले मरता है। यूरोप में यह भावना गहरी हुई कि अब अमेरिका “साथी” नहीं, “सौदागर” है।

ट्रंप का अपमान सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहता है। सार्वजनिक मंचों पर तिरस्कार। ट्वीट्स में व्यंग्य। बैठकों में उपेक्षा और मीडिया के सामने कटाक्ष। यह सब व्यक्तिगत स्तर पर नहीं है, राष्ट्रीय स्मृति में दर्ज होता है। राष्ट्र अपमान भूलते नहीं है। वे शांत रहते हैं, पर स्मृति संजोते हैं। आज जो मित्र मुस्कुरा रहे हैं, कल वे विकल्प खोजेंगे।

जब मित्रों का भरोसा डगमगाता है, तो शत्रुओं का साहस बढ़ता है। क्योंकि महाशक्ति की अस्थिरता दूसरों को अवसर देती है। ट्रंप की अनिश्चित नीति ने यह संकेत दिया कि अमेरिका का रुख अचानक बदल सकता है। उसकी प्रतिबद्धताएँ स्थायी नहीं हैं। उसके निर्णय व्यक्तिगत मनोदशा पर निर्भर हैं। यह स्थिति उन शक्तियों के लिए सुनहरा अवसर बनती है, जो वैश्विक संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ना चाहती हैं।

ट्रंप समर्थक कहते हैं कि “दुनिया उनसे डरती है।” लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया उनसे डरती नहीं है, भ्रमित रहती है। डर स्पष्टता से पैदा होता है,  जब आपको पता हो कि सामने वाला कब और कैसे वार करेगा। भ्रम अस्थिरता से पैदा होता है, जब सामने वाला हर पल बदल सकता है। भ्रम से आदर नहीं उपजता है, केवल अवसरवाद जन्म लेता है।

वैश्विक शांति सामरिक संतुलन पर टिकी होती है। मित्र जानते हैं कि “संकट में अमेरिका हमारे साथ खड़ा होगा।” शत्रु जानते हैं कि “सीमा पार करने की कीमत चुकानी होगी।” लेकिन जब मित्रों को भरोसा न रहे। शत्रुओं को स्पष्ट संदेश न मिले, तो संतुलन टूटता है। ट्रंप के पहले वर्ष में यही स्थिति उभरी है कि मित्र असमंजस में हैं और शत्रु परीक्षण कर रहे हैं।

इतिहास में ऐसे कई क्षण आए हैं जब महाशक्तियों की अस्थिरता ने विश्व को संकट में डाला। रोमन साम्राज्य का पतन, प्रथम विश्वयुद्ध से पहले यूरोप, शीतयुद्ध के कुछ खतरनाक मोड़, हर बार संतुलन का टूटना, संघर्ष की भूमिका बना है। आज दुनिया फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहाँ नेतृत्व की भाषा विश्व की दिशा तय करेगी।

ट्रंप की शैली ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि “क्या अमेरिका पर हमेशा निर्भर रहा जा सकता है?” यह प्रश्न अपने आप में एक ऐतिहासिक बदलाव है। जब मित्र विकल्प खोजने लगते हैं, तो महाशक्ति धीरे-धीरे केवल शक्ति रह जाती है, नेतृत्व नहीं।

राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं होती है। वह मनुष्य की पीड़ा, उसकी आशा, उसके भय और उसके भविष्य से जुड़ी होती है। महाशक्ति की पहचान केवल उसकी सैन्य क्षमता से नहीं होती है, बल्कि इस बात से होती है कि वह संकट में मनुष्य के साथ खड़ी होती है या केवल अपने हित के साथ। डोनाल्ड ट्रंप के पहले वर्ष ने दुनिया को यह एहसास कराया है कि उनकी राजनीति का केंद्र मानवता नहीं, वर्चस्व है।

युद्ध, आतंक और जलवायु परिवर्तन दुनिया को शरणार्थियों की ओर धकेल रहा है। यह केवल जनसंख्या का प्रवाह नहीं, मानव त्रासदी है। लेकिन ट्रंप की भाषा में शरणार्थी “बोझ” हैं। प्रवासी “खतरा” हैं और दरवाजे “बंद” किए जाने चाहिए। उनके लिए ये लोग चेहरे नहीं हैं, आँकड़े हैं। राजनीति जब मनुष्य को संख्या में बदल देती है, तब संवेदना पहली बलि बनती है।

दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध चल रहा है। कहीं बम गिर रहे हैं। कहीं बच्चे भूखे हैं और कहीं शहर मलबे में बदल गए हैं। महाशक्ति का दायित्व होता है कि संघर्ष को रोकने की कोशिश करना। लेकिन ट्रंप की दृष्टि में रणनीतिक अवसर है युद्ध। सौदेबाजी का मंच है संकट। दबाव बनाने का साधन है पीड़ा। जब पीड़ितों की तस्वीरें नीति में केवल “लीवरेज” बन जाएँ, तो राजनीति मानवता से कट जाती है।

जलवायु संकट आज की राजनीति नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का प्रश्न है। यह तय करेगा कि धरती रहने योग्य रहेगी या नहीं? समुद्र किनारे बसे देश बचेंगे या नहीं? खेती संभव रहेगी या नहीं? लेकिन ट्रंप की राजनीति आज से आगे नहीं देखती। उनकी प्राथमिकता है “आज का उद्योग, आज का लाभ और आज का वोट।” भविष्य उनकी सूची में नीचे है। जब सत्ता केवल वर्तमान में जिए, तो भविष्य अनाथ हो जाता है।

राजनीति केवल निर्णयों से नहीं, भाषा से भी बनती है। किसी राष्ट्राध्यक्ष के शब्द दुनिया को यह बताता हैं कि वह दुख को कैसे देखता है। ट्रंप की भाषा में त्रासदी पर मौन, पीड़ा पर व्यंग्य और संकट पर आत्मप्रशंसा। कभी-कभी उनके शब्दों में ऐसा लगता है जैसे दुनिया की आग में भी वे अपना आईना देख रहे हों। यह केवल शैली नहीं, यह दृष्टि है।

ट्रंप की विदेश नीति का मूल मंत्र है “ताकत ही सत्य है।” इस दृष्टि में कमजोर की पीड़ा अप्रासंगिक है। छोटे देशों की आवाज महत्वहीन है और नैतिकता केवल भाषण की चीज़ है। यह राजनीति सभ्यता की नहीं, साम्राज्य की है। सभ्यता पूछती है कि “दुनिया कैसी होनी चाहिए?” वर्चस्व पूछता है कि “मेरे लिए दुनिया कैसे काम करे?”

ट्रंप की नीति में “राष्ट्र” इतना बड़ा हो जाता है कि “मनुष्य” उसके नीचे दब जाता है। वे कहते हैं कि “मैं अमेरिका के लिए चुना गया हूँ, दुनिया के लिए नहीं।” यह वाक्य लोकतंत्र में तार्किक लग सकता है, लेकिन महाशक्ति के संदर्भ में यह अधूरा सत्य है। क्योंकि महाशक्ति का हर निर्णय दूसरों की जिन्दगी बदलता है। जब फैसले दूसरों की सांसों पर असर डालते हों, तो केवल मतदाताओं की बात करना नैतिक रूप से पर्याप्त नहीं होता है।

सभ्यता की कसौटी यह नहीं होती कि कितने शक्तिशाली हैं, बल्कि यह होती है कि शक्ति के साथ कितने मानवीय हैं। ट्रंप के पहले वर्ष ने यह प्रश्न पूरी दुनिया के सामने रख दिया है कि क्या 21वीं सदी वर्चस्व की ओर लौटेगी या मानवता की ओर बढ़ेगी? और क्या दुनिया का सबसे शक्तिशाली पद संवेदना से चल सकता है या केवल अहंकार से?
            

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