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"नेपथ्य"

"नेपथ्य"

पंकज शर्मा
मैंने बहुत पहले
दृश्यों पर भरोसा करना छोड़ दिया।
जो दिखाई देता है
वह घटित नहीं होता,
और जो घटित होता है
उसका दृश्य-रूप नहीं बनता।


मंच पर शब्द हैं—
सुसंस्कृत, अभ्यास से चमकाए हुए,
वे सत्य का अभिनय करते हैं
इतनी कुशलता से
कि सत्य स्वयं
संदेह में पड़ जाता है
अपने अस्तित्व को लेकर।


भीड़ ताली बजाती है,
क्योंकि ताली बजाना
एक सामाजिक शिष्टाचार है,
जैसे शोक मनाना,
जैसे उत्साह प्रकट करना—
सब कुछ समयबद्ध,
सब कुछ निर्देशित।


मैं देखता हूँ
आँखों से गिरते तरल को
और जानता हूँ—
यह पीड़ा नहीं,
यह केवल
भावना का रसायन है,
जो सही क्षण पर
त्वचा पर बहना सिखाया गया है।


संघर्ष भी अब
स्वाभाविक नहीं रहे—
वे योजनाओं की
शतरंजी बिसात पर
रचे जाते हैं,
जहाँ हर हार
पहले से
किसी की जीत होती है।


इसलिए
अब दृश्य मुझे व्यथित नहीं करते।
व्यथा वहाँ है
जहाँ कोई प्रकाश नहीं,
जहाँ संवाद नहीं,
जहाँ मौन भी
अप्रस्तुत है।


नेपथ्य में
मनुष्य खड़ा है—
बिना भूमिका,
बिना अभ्यास,
अपने ही भीतर से
उतरा हुआ।


और वही
एकमात्र सत्य है
जो मंच पर
कभी नहीं आएगा।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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