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समाज के बारे में सोचे

समाज के बारे में सोचे

संजय जैन


आज में अपने देश समाज की भावनाओं को ध्यान में रखकर लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। कहाँ से हम लोग चले थे और कहाँ तक आ पहुंचे है, सोचने की बात है?
समाज का पतन हमारे सामाजिक कार्यकर्ता ही करने पर उतारू है। आप खुद ही देख सकते है की जहाँ जहाँ पर ये लोग विराजमान है वहाँ से अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव तक हटते नही या हटाना नही चाहते और न ही अपने ट्रस्ट, मंडल या समितियों का हिसाब किताब देने को तैयार होते है। क्योंकि इतनी सारी अनिमियताएँ और लेखा जोखा में हेरा फेरी है की जिसके कारण इन लोगों को बहुत ज्यादा डर लगता है और अपने कार्यो का दुसरो से मूल्यांकन भी नही करा सकते है। इसलिए भी अपन पदों से ये नही हटते है। हर जाति धर्म की संस्थाओं का यही हाल है। यही हाल शासन प्रशासन और विभागों का है। आज के महौल में कोई भी अपना पद त्यागने को तैयार नही है भले ही उम्र हो गई हो परंतु अपने आप को सेवा मुक्त नही करते। जिसके कारण ही हमारा पतन हो रहा है और ज्ञानवान लोगों की उपेक्षा हो रही है। इसलिए ये लोग या तो समाज और देश से दूर चले जाते है या अपने आप को सबसे दूर कर लेते है। जिसके कारण उनका ज्ञान भी छिड़ होने लगता है और वो एकाकी बन जाते है। इसका मूल कारण लोगों की निरक्षरता ही है। यदि हमारी समाज का उथान करना हो तो सबसे पहले खुदकी सोच को बदलना पड़ेगा और साथ ही अपनी महत्वकांक्षाओं को समाज पर नही थोपना चाहिए और न ही अपने उत्तराधिकारी को स्वयं चुने। ये अधिकार समाज के लोगों होना चाहिए। तभी हमारे समाज का उथान हो सकेगा।
जरा सोचे समझे और करे विचार,
की कैसे हम अपने समाज और स्वयं का उथान करे। इसलिए जनहित में कृपा करें और यथा समय उचित कदम उठाकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करे और समाज की उन्नति के लिए त्याग भावनाएं बनाये। यदि इतना कर सके तो हमारे समाज का पतन थम जायेगा और समाज का नाम देश दुनियाँ में होगा। यदि मेरे लेख से किसी की भावनाओं को ठेस लगी हो तो क्षमा करें। मैंने जो देखा और मेहसूस किया उसे ही लिखा है।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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