लहरे तिरंगा
अरुण दिव्यांशआसमान में तिरंगा लहरे ,
घाव किसी के होते गहरे ।
पढ़ाता नासमझी पहाड़ा ,
स्वयं पढ़ जाता ककहरे ।।
खड़ा नहीं जो तिरंगा तले ,
संविधान से रहता जो दूर ।
कान रहते बहरा बना हो ,
ऑंख रहते जो बना सूर ।।
नहीं हो सकता भारतीय ,
देशद्रोही के केस चलाओ ।
डाल दो कैदखाने में इसे ,
कारावास में इसे सड़ाओ ।।
देश से जिसने दगा किया ,
देश का कहाॅं वह सगा है ।
दुश्मन ने जब पीछा किया ,
वह पीछे को ही तो भगा है ।।
जिसका खा उसी को मारे ,
उसका शीघ्र बंद निवाला हो ।
या तो जीवन हो देशहित में ,
या देश से शीघ्र निकाला हो ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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