इंडी और एनडीए शासन में - सवर्ण होना क्या अपराध है?
दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |आज का भारत एक विचित्र विडंबना से गुजर रहा है। एक ओर संविधान की प्रस्तावना में समानता, न्याय और बंधुत्व का उद्घोष है, तो दूसरी ओर सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार में एक पूरा वर्ग स्वयं को संदेह के कटघरे में खड़ा महसूस कर रहा है। यह वर्ग कोई अल्पसंख्यक नहीं है, कोई सत्ता-वंचित समूह नहीं है बल्कि वह समाज है जिसे आज “सवर्ण” कहकर संबोधित किया जाता है। आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सवर्ण होना अब एक दंडनीय सामाजिक पहचान बन चुका है? क्या इंडी गठबंधन और एनडीए, दोनों की राजनीति में सवर्ण केवल एक बोझ बनकर रह गया है? क्या भारतीय लोकतंत्र अब जातीय गणित के आगे आत्मसमर्पण कर चुका है?
सामान्य धारणा यह बना दी गई है कि सवर्ण समाज ही सत्ता, संसाधन और अवसरों का एकमात्र उपभोक्ता रहा है। लेकिन क्या यह धारणा आज के भारत में पूरी तरह सत्य है? जबकि वास्तविकता यह है कि सवर्ण समाज संगठित वोट बैंक नहीं है। उसका कोई एक राजनीतिक प्रवक्ता नहीं है। वह विभाजित है आर्थिक, शैक्षणिक और भौगोलिक स्तर पर। इसके बावजूद राजनीति ने उसे एक सामूहिक अपराधी की तरह प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। आज यदि कोई सवर्ण अपनी कठिनाइयों की बात करता है, तो उसे तुरंत यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि “इतिहास में तुम्हें बहुत मिला है, अब चुप रहो।” क्या लोकतंत्र में नागरिक के अधिकार उसके पूर्वजों के आधार पर तय किए जाने चाहिए?
आरक्षण की अवधारणा संवैधानिक और नैतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। लेकिन समस्या आरक्षण से नहीं, उसके राजनीतिक उपयोग से है। आज स्थिति यह है कि बिना समग्र सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के आरक्षण का विस्तार किया जा रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों की समस्याओं को हाशिए पर डाल दिया गया है। योग्यता को धीरे-धीरे संदिग्ध और अपराधबोध से ग्रस्त अवधारणा बनाया जा रहा है। ईडब्ल्यूएस आरक्षण को भी अनिच्छा से स्वीकार किया गया है। लगातार न्यायिक और राजनीतिक संदेह के घेरे में रखा गया है। यह संकेत देता है कि सवर्णों को राहत नहीं, केवल सांत्वना दी जा रही है।
इंडी गठबंधन स्वयं को सामाजिक न्याय का रक्षक बताता है। लेकिन व्यवहार में उसकी राजनीति स्पष्ट जातीय ध्रुवीकरण पर आधारित है। सवर्ण समाज को वह या तो “शोषक” कहता है या “अप्रासंगिक”। कहीं भी यह स्वीकार नहीं किया जाता कि सवर्ण समाज में भी गरीबी है, बेरोजगारी है और मानसिक असुरक्षा है। इंडी गठबंधन के विमर्श में सवर्ण केवल एक ऐतिहासिक दोष बनकर रह गया है, वर्तमान नागरिक नहीं।
भाजपा का नारा है “एक भारत, श्रेष्ठ भारत”। लेकिन जमीनी अनुभव कहता है कि सवर्ण समाज की शिकायतें राजनीतिक प्राथमिकता नहीं हैं। पार्टी नेतृत्व यह मान बैठा है कि सवर्ण वोट स्वतः उपलब्ध है। इसलिए उसकी पीड़ा को अनदेखा किया जा सकता है। यह रणनीतिक भूल है। कोई भी समाज लगातार उपेक्षित रहकर न तो मौन रहता है, न ही सदैव सहनशील।
आज जब कुछ लोग कहते हैं कि अलग विद्यालय, अलग अस्पताल और योग्यता आधारित संस्थान हो तो इसे अलगाववाद कहा जाता है। लेकिन यह अलगाव नहीं है, बल्कि सुरक्षा की माँग है। जब जाति पूछकर इलाज हो। प्रवेश में उपनाम बोझ बन जाए। योग्यता पर अपराधबोध थोपा जाए। तो समाज आत्मरक्षा की भाषा बोलने लगता है।
संविधान कहता है कि “सभी नागरिकों को समान अवसर।” लेकिन व्यवहार कहता है कि कुछ वर्गों के लिए अवसर और कुछ के लिए अपराधबोध। यह अंतर संविधान का नहीं है, बल्कि राजनीति की व्याख्या का है। यदि संविधान को केवल चुनावी भाषणों तक सीमित कर दिया गया, तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा। इतिहास गवाह है जिस समाज को लगातार अपमानित किया जाता है, तो वह एक दिन प्रश्न नहीं करता है निर्णय करता है। यह निर्णय लोकतांत्रिक भी हो सकता है, वैचारिक भी और खतरनाक भी। राजनीति को यह समझना होगा कि किसी भी समाज को स्थायी रूप से अपराधी नहीं बनाया जा सकता है।
आज इंडी और एनडीए में अंतर नीतियों का नहीं है, प्रस्तुति का रह गया है। दोनों ही सवर्ण समाज को या तो मौन रखते हैं या राजनीतिक सुविधा के अनुसार प्रयोग करते हैं।
भारत में जाति कभी केवल सामाजिक संरचना थी, जो धीरे-धीरे राजनीतिक रणनीति बन गई और अब वह सत्ता प्राप्ति का सबसे सटीक औजार बन चुकी है। आज चुनाव इस आधार पर नहीं लड़े जाते हैं कि शिक्षा कैसी होगी? रोजगार कैसे बढ़ेगा? स्वास्थ्य व्यवस्था कैसे सुधरेगी? बल्कि इस आधार पर लड़े जाते हैं कि कौन-सी जाति किसके खिलाफ खड़ी की जा सकती है। इस खेल में सवर्ण समाज सबसे आसान निशाना बन गया है, क्योंकि वह बिखरा हुआ है। वह अपनी पीड़ा को राजनीतिक भाषा में व्यक्त नहीं करता है और उसे यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि “तुम्हें पहले बहुत मिला है”।
सतही तौर पर इंडी और एनडीए एक-दूसरे के विरोधी दिखते हैं, लेकिन जातीय राजनीति के प्रश्न पर दोनों की दिशा लगभग समान है। इंडी गठबंधन सवर्ण को ऐतिहासिक अपराधी के रूप में प्रस्तुत करता है। हर असमानता का दोष उसी पर मढ़ देता है और वर्तमान सामाजिक-आर्थिक बदलावों को स्वीकार नहीं करता है। वहीं एनडीए / भाजपा सवर्ण को “स्वाभाविक समर्थक” मानकर चलता है। उसकी समस्याओं को राजनीतिक जोखिम मानता है और इसलिए उन्हें एजेंडे से बाहर रखता है। परिणाम स्वरूप सवर्ण समाज दोनों ओर से राजनीतिक रूप से अनाथ हो गया है।
आरक्षण का उद्देश्य था समान अवसर सुनिश्चित करना। लेकिन आज यह बन गया है समान अवसर को सीमित करने का साधन। बिना जाति आधारित आर्थिक आँकड़ों के, क्षेत्रीय असमानताओं के अध्ययन के और शिक्षा की गुणवत्ता सुधार के, आरक्षण का लगातार विस्तार सामाजिक संतुलन को बिगाड़ रहा है। यह कहना जरूरी है कि आरक्षण की आलोचना सामाजिक न्याय का विरोध है और आरक्षण पर प्रश्न उठाना वंचित वर्गों से घृणा है। लेकिन राजनीति ने इन दोनों को जानबूझकर मिला दिया है।
आज एक अजीब माहौल बन गया है यदि कोई सवर्ण छात्र सफल हो जाए, तो उस पर संदेह और यदि वह संघर्ष की बात करे, तो उपहास। मेहनत, योग्यता और प्रतिस्पर्धा को इस तरह पेश किया जा रहा है मानो वह किसी विशेष वर्ग के खिलाफ षड्यंत्र हों। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि समाज में उत्कृष्टता का सम्मान घट रहा है और औसतपन को नैतिकता का जामा पहनाया जा रहा है। कोई भी राष्ट्र औसत सोच के भरोसे महान नहीं बनता है।
सवर्ण समाज की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह स्वयं को संगठित नहीं कर पाया, उसने राजनीति को हमेशा “गंदा काम” समझा और अपने प्रतिनिधित्व को महत्व नहीं दिया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। आज सवर्ण युवाओं में असंतोष है। मध्यवर्ग में भय है और ग्रामीण सवर्ण समाज में उपेक्षा की पीड़ा है। यह मौन असंतोष है और इतिहास बताता है कि मौन असंतोष सबसे खतरनाक होता है।
जब लोग कहते हैं कि अलग विद्यालय, अलग अस्पताल, योग्यता आधारित संस्थान तो इसे तुरंत “अलगाववादी सोच” कह दिया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह अलगाव नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की रक्षा की पुकार है। कोई भी समाज अपमान, उपेक्षा और अपराधबोध के साथ लंबे समय तक नहीं जी सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत का भविष्य केवल जातीय ध्रुवीकरण पर टिका है? यदि हाँ, तो राष्ट्रीय एकता केवल नारे रह जाएगी। संविधान केवल पुस्तकों में सिमट जाएगा और लोकतंत्र संख्या का खेल बनकर रह जाएगा। यदि नहीं, तो अब राजनीति को रीसेट करना होगा और हर वर्ग की पीड़ा को स्वीकार करना होगा।
यह प्रश्न असहज है, लेकिन जरूरी है कि क्या सवर्ण विरोध आज नैतिक विमर्श है या राजनीतिक सुविधा? क्योंकि सवर्णों पर हमला करने से वोट नहीं घटते बल्कि नए गठजोड़ बनते हैं और विरोध की कोई राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती है। यही कारण है कि यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है।
आज भारत उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ या तो वह संतुलित सामाजिक न्याय की ओर जाएगा या फिर स्थायी सामाजिक विभाजन की ओर। सवर्ण समाज की पीड़ा को नकारना आग को राख से ढकने जैसा है। आग बुझती नहीं, भीतर सुलगती रहती है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में जिन शब्दों को सबसे अधिक सम्मान दिया गया है, वे हैं न्याय, समानता और बंधुत्व। लेकिन आज प्रश्न यह है कि क्या ये मूल्य वास्तव में सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू हो रहे हैं? संविधान नागरिक को उसकी जाति से नहीं, नागरिकता से पहचानता है। लेकिन राजनीति नागरिक को पहले जाति में बाँटती है, फिर अधिकार तय करती है। यह टकराव केवल वैचारिक नहीं है, व्यवस्थागत बन चुका है।
आज समानता की व्याख्या बदल दी गई है। पहले समानता का अर्थ था सभी को समान अवसर। आज समानता का अर्थ बना दिया गया है सभी को समान परिणाम। यह बदलाव खतरनाक है। क्योंकि अवसर देना राज्य का कर्तव्य है। परिणाम तय करना समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया। जब राज्य परिणाम तय करने लगता है तो योग्यता, परिश्रम और प्रतिभा राजनीतिक अपराध बन जाता है।
सामाजिक न्याय का उद्देश्य था ऐतिहासिक वंचना को दूर करना। समाज को मुख्यधारा में लाना। लेकिन राजनीतिक न्याय का उद्देश्य बन गया है वोट बैंक को स्थायी बनाना और जातीय असंतोष को ईंधन बनाना। यही कारण है कि सुधार की कोई समयसीमा नहीं तय की जाती है। आरक्षण की समीक्षा “राजनीतिक आत्महत्या” मान ली जाती है। यह स्थिति सामाजिक न्याय के साथ अन्याय है।
आज सवर्ण समाज से यह अपेक्षा की जाती है कि वह चुप रहे। अपनी कठिनाइयों का ज़िक्र न करें और हर नीति को “ऐतिहासिक प्रायश्चित” मानकर स्वीकार करे। यह अपराधबोध थोपा गया है, स्वीकार किया हुआ नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में नागरिक अपराधी नहीं होता है, जब तक वह अपराध न करे। जाति अपराध नहीं हो सकती।
न्यायपालिका ने कई बार संतुलन बनाने की कोशिश की। क्रीमी लेयर, 50% की सीमा और ईडब्ल्यूएस आरक्षण। लेकिन हर बार राजनीतिक दबाव, सामाजिक भावनात्मक उबाल और चुनावी गणित इन प्रयासों को कमजोर करता रहा। इससे न्यायपालिका भी एक कठिन स्थिति में आ गई है संविधान बनाम जनभावना।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण को सवर्ण समाज के लिए “न्याय” बताया गया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इसकी सीटें सीमित हैं। इसका क्रियान्वयन असमान है और इसे लगातार संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। यह संदेश देता है कि सवर्ण को अधिकार नहीं, अनुग्रह दिया गया है और अनुग्रह कभी स्थायी समाधान नहीं होता है।
आज शिक्षा संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया, छात्रवृत्तियाँ और नियुक्तियाँ सब कुछ जाति-आधारित गणित से प्रभावित है। लेकिन सवर्ण छात्र की असफलता “अयोग्यता” है और वंचित वर्ग की असफलता “व्यवस्था की विफलता” है। यह दोहरा मानदंड धीरे-धीरे शिक्षा की आत्मा को नष्ट कर रहा है।
आज विमर्श ऐसा बना दिया गया है कि सवर्ण होना विशेषाधिकार, संघर्ष की बात करना ढोंग और समानता माँगना असंवेदनशीलता। यह नैतिक लेबलिंग खतरनाक है। क्योंकि लोकतंत्र नैतिक अपराधबोध से नहीं, संवैधानिक अधिकारों से चलता है।
मीडिया और तथाकथित बौद्धिक वर्ग सवर्ण पीड़ा को “रोना” कहकर टाल देता है। लेकिन जातीय उग्रता को “सामाजिक चेतना” बताता है। इससे समाज में संवाद नहीं, विभाजन बढ़ता है। संवाद का अभाव टकराव की भूमिका बनाता है।
संविधान में सबसे कम चर्चा जिस शब्द पर होती है, वह है बंधुत्व। आज न्याय जाति में बँटा है। समानता शर्तों में बँटी है और बंधुत्व कहीं खो गया है। बिना बंधुत्व कोई भी समाज स्थायी नहीं रह सकता है।
यह समझना आवश्यक है कि सवर्ण समाज का मौन समर्थन नहीं है। यह विवशता है।सामाजिक बदनामी का डर है। लेकिन यह मौन स्थायी नहीं रहता है। इतिहास में जब मौन टूटता है, तो वह शोर नहीं करता है बल्कि दिशा बदल देता है।
राजनीति की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह सवर्ण असंतोष को “काल्पनिक” मानती है। उसे सोशल मीडिया की शिकायत समझती है, लेकिन बेरोजगारी, आत्महत्या और पलायन, यह सब आँकड़े नहीं हैं, चेतावनी संकेत हैं।
संविधान किसी एक वर्ग का नहीं है, वह पूरे राष्ट्र का सामाजिक अनुबंध है। यदि राजनीति समानता को चयनात्मक बनाएगी। न्याय को जाति से जोड़ेगी और बंधुत्व को भूल जाएगी। तो लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया बनकर रह जाएगा।
किसी भी सामाजिक या राजनीतिक समस्या का समाधान तभी संभव है, जब पहले यह स्वीकार किया जाए कि समस्या अस्तित्व में है। आज की राजनीति की सबसे बड़ी विफलता यही है कि वह सवर्ण असंतोष को मानने से इनकार करती है। उसे “काल्पनिक पीड़ा” या “विशेषाधिकार की आदत” कहकर खारिज कर देती है। जब तक यह मानसिकता बनी रहेगी तब तक समाधान नहीं, केवल टालने की राजनीति होती रहेगी।
यह स्पष्ट कहना आवश्यक है कि आरक्षण का पुनर्मूल्यांकन, आरक्षण का विरोध नहीं है। आज आवश्यकता है कि वस्तुनिष्ठ सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की। समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा की और यह देखने की कि लाभ वास्तव में किन तक पहुँचा।यदि एक ही वर्ग की एक ही उप-जाति पीढ़ियों तक लाभ ले रही है और उसी वर्ग के अन्य लोग हाशिये पर हैं तो यह सामाजिक न्याय नहीं, राजनीतिक सुविधा है।
क्रीमी लेयर की अवधारणा केवल ओबीसी तक सीमित क्यों? यदि उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करना है तो क्रीमी लेयर का सिद्धांत सभी आरक्षित वर्गों पर लागू होना चाहिए। यह वंचितों के अधिकारों की रक्षा करेगा और वास्तविक जरूरतमंदों तक अवसर पहुँचाएगा। इससे सामाजिक न्याय मजबूत होगा, कमजोर नहीं।
राजनीतिक विमर्श ने योग्यता और सामाजिक न्याय को एक-दूसरे का शत्रु बना दिया है। जबकि सत्य यह है कि योग्यता समाज को आगे ले जाती है और अवसर समानता समाज को जोड़ती है। दोनों का संतुलन ही;राष्ट्र निर्माण का आधार होता है।:यदि योग्यता को अपराध बनाया गया तो देश औसतपन में फँस जाएगा।
आरक्षण से अधिक जरूरी है प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता, ग्रामीण और शहरी स्कूलों के बीच अंतर कम करना और शिक्षकों की जवाबदेही। जब शिक्षा मजबूत होगी तब आरक्षण अपने आप कम प्रासंगिक हो जाएगा। लेकिन यह दीर्घकालिक समाधान है और राजनीति अक्सर त्वरित लाभ चाहती है।
यह स्वीकार करना होगा कि सवर्ण समाज ने राजनीति से दूरी बनाई है। उसने संगठित प्रतिनिधित्व नहीं खड़ा किया है और समस्याओं को निजी संघर्ष मानकर सहता रहा है। लेकिन अब समय आ गया है संवाद का, लोकतांत्रिक भागीदारी का और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने का। असंतोष यदि दिशा नहीं पाएगा तो वह भटक सकता है।
अलग विद्यालय, अलग अस्पताल जैसी बातें चेतावनी हैं, लक्ष्य नहीं। इसका अर्थ है समाज में भरोसा टूट रहा है और सम्मान की कमी महसूस हो रही है। राज्य का कर्तव्य है कि वह अलगाव की नौबत आने से पहले विश्वास बहाल करे।
राजनीति को यह समझना होगा कि कोई भी समाज स्थायी रूप से “डिफ़ॉल्ट समर्थक” नहीं होता है और कोई भी समाज हमेशा “बलि का बकरा” नहीं बना रह सकता है। आज सवर्ण समाज प्रश्न पूछ रहा है कि कल वह निर्णय भी कर सकता है। यह निर्णय मतदान का। वैचारिक समर्थन का या राजनीतिक दूरी का हो सकता है और तब इसकी जिम्मेदारी राजनीति की होगी।
“एक भारत, श्रेष्ठ भारत” केवल नारा नहीं होना चाहिए बल्कि यह व्यवहार में दिखना चाहिए। यदि एक वर्ग को बार-बार अपराधबोध में रखा जाएगा तो उसकी पीड़ा को उपहास बनाया जाएगा तो एकता खोखली हो जाएगी। राष्ट्रीय एकता का अर्थ है सबको सुनना, सबका सम्मान।
आज सबसे बड़ी जरूरत है ईमानदार संवाद की। बिना लेबल और आरोप के बातचीत की। जब संवाद समाप्त होता है तब टकराव शुरू होता है। राजनीति, मीडिया और समाज, तीनों को यह समझना होगा।
अंततः प्रश्न यही है कि क्या भारत का भविष्य जाति से तय होगा या नागरिकता से? यदि जाति से तो विभाजन बढ़ेगा। असंतोष गहराएगा और लोकतंत्र कमजोर होगा। यदि नागरिकता से तो समानता वास्तविक बनेगी। योग्यता सम्मान पाएगी और सामाजिक न्याय संतुलित होगा।
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