दादा के वैवाहिक सालगिरह
अरुण दिव्यांशआईल विचार दादा के मन में ,
खुशी दउड़ल दादा के तन में ।
दादी सुनवलन आपन विचार ,
फेर से उतरल जाव ई रन में ।।
आवत बा वैवाहिक वर्षगांठ ,
फेर होखे बियाह के तईयारी ।
फेर बढ़ी मेल - जोल आपन ,
फेर से होई हमनियो के यारी ।।
दादी गईली आपन नईहर में ,
दादा बन चल दिहलन दूल्हा ।
बेटा पतोह भईल गोर दिमाग ,
दादा दादी हो गईलन कुल्हा ।।
पोता पोती भईल हाथ धड़ ,
फेर से भईल दादी से बियाह ।
बियाह त होखेला एके बेरी ,
बाबा त बन गईलन दोआह ।।
दादा चललन बियाह करे ,
दादा के मुॅंह में दाॅंत नईखे ।
दादा के देह सब हड्डी लउके ,
दादा के देह में ऑंत नईखे ।।
दादा के दहेज दादुर मिलल ,
ऊपर से आउर बादुर मिलल ।
दादी अईली ससुरार वापस ,
बूढ़ मन अब बहादुर मिलल ।।
शब्दार्थ : गोर = पैर , दादुर = मेंढ़क , बादुर = चमगादड़
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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