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नर, पशु एवं धर्म विवेक

नर, पशु एवं धर्म विवेक

जय प्रकाश कुवंर
जगत के नियंता ने इस पृथ्वी पर चल प्राणियों में नर और पशु इन दोनों को जीवन दिया है। अगर तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो नर अथवा मनुष्य की तुलना में पशुओं की संख्या बहुतायत में है। फिर भी मनुष्य को पृथ्वी का श्रेष्ठ और सबसे बड़ा बुद्धिमान प्राणी माना जाता है।
लेकिन वर्तमान संदर्भ में देखा जाए तो मनुष्य का स्तर आज कल पशुओं से भी नीचे जा रहा है। जीवन जीने के लिए नर और पशु में बहुत सारी सामान्य बातें और गुण हैं। लेकिन कुछ बातें और गुण ऐसे हैं जो मनुष्य को पशु से भिन्न करते हैं।
हमारे शास्त्रों हितोपदेश में एक श्लोक हैं, जिसमें कहा गया है कि :-
आहार,निद्रा, भयं, मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभि:नराणाम्।
धर्मों हि तेषाम् अधिको विशेष: धर्मेण हीना: पशुभि: समाना: ।।
अर्थात भोजन, नींद, डर और यौन संबंध (मैथुन ), ये सभी गुण मनुष्य और पशु दोनों में समान है। लेकिन मनुष्य में धर्म यानि कर्तव्य और विवेक ही ऐसा विशेष गुण है जो उसे पशु से अलग करता है। और इसिलिए मनुष्य को पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ जीव माना जाता है।
पशु हिंसक होते हैं क्योंकि ईश्वर ने उन्हें सींग और पूंछ दिया है। वहीं मनुष्य को सींग पूंछ हीन बनाकर उसे ईश्वर ने बुद्धि और विवेक प्रदान किया है। लेकिन जिस मनुष्य में बुद्धि और विवेक नहीं है, वह बिना सींग और पूंछ का अशोभन, निकम्मा और जगत के लिए दुखदायी जन्तु है।
जो मनुष्य काम क्रोध आदि दुर्गुणों को जीत कर परमात्मा को प्राप्त कर ले वही सच्चा नर है। जहाँ तक धर्म का सवाल है, तो साधारण शब्दों में धर्म का अर्थ है जो कर्तव्य धारण करने योग्य हो, यानि अहिंसा, न्याय, सदाचरण और सद्गुण आदि।
लेकिन दुःख की बात यह है कि आजकल सभी लोग घर, परिवार, राह, देश, विदेश में रहकर केवल आतंक और लड़ाई की चर्चा और कार्यान्वयन में मशगूल हैं, जो हमें पशुता की ओर ले जा रहा है। धर्म की चर्चा आते ही लोग धर्म की आलोचना समालोचना में लग जाते हैं। सभी लोग पारिवारिक, घरेलू तथा अंतर्राष्ट्रीय हिंसा और आतंकवाद से पीड़ित हैं।
यौन संबंध किसी भी के साथ केवल पशुओं में ही होता था।मनुष्य में धर्म सम्मत यौन संबंध हुआ करता था। लेकिन आज कल मनुष्य सभी मर्यादित रस्मों को तोड़ कर हैवानियत पर उतर गया है। आज कल इसके लिए कोई सीमा रेखा नहीं रह गई है।
खान पान में भी मनुष्य पशुओं को पार कर गया है। पशु तो कुछ हद तक अपने निर्धारित भोजन , जैसे अन्न, घास पात तथा कुछ हिंसक पशु मांस आदि पर अब भी आधारित हैं, लेकिन मनुष्य अब कुछ भी खाने से परहेज नहीं करता है और मांस मदिरा तो निहायत जरूरी बन गया है। मांस मदिरा का सेवन मनुष्य को अधर्म के रास्ते की ओर ले जाता है और वह आक्रामक, दूसरों को पीड़ा पहुंचाने वाला, अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए दूसरों और समाज को नुकसान पहुंचाने वाला बन गया है। आज का मनुष्य व्यभिचार, धार्मिक तथा जातीय उग्रवाद एवं सत्ता की लालसा में संलिप्त है।
नर अथवा मनुष्य का काम है मानवता को उच्चतम प्रवृत्ति की ओर ले जाना और समाज में सुख शांति बनाए रखना। लेकिन ज्ञान और धर्म के अभाव में वह पशु बन गया है। जिन मनुष्यों के पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, मानवीय गुण और धर्म का अभाव है, वे इस संसार में धरती पर बोझ बने हुए मनुष्य के रूप में विचरण करने वाले पशु के सिवा और कुछ नहीं हैं।

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