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स्मृति के दृग पटल पर

  

स्मृति के दृग पटल पर

डॉ रीमा सिन्हा
स्मृति के दृग पटल पर,
कनक थाल से आते रहे।
सोचा तुम मुझसे हो,
स्वप्न यही भरमाते रहे...
अलि गुंजन ने भ्रमित किया,
संदेश तुम्हारे आने का,
मलय पवन के सौरभ ने,
प्रणय प्रगाढ़ पाने का।
आकुल विरहन के मन को,
महावर,अंजन से सजाते रहे।
स्वप्न यही भरमाते रहे...
स्त्रीत्व की शक्ति अनोखी,
प्रिय! तुमपर किया न्योछावर,
अश्रुओं को ढाल बनाकर,
स्वर्ण स्वप्नों का सजाया घर,
प्रतिपल तुझमें ढूँढा स्वयं को,
तम में अभिलाषा दीप जलाते रहे,
स्वप्न यही भरमाते रहे...
है यही इतिहास आलि,
यही है वर्तमान,भविष्य,
हूँ चिरंतन स्वामिनी,
मरती हूँ तेरे प्रीत पर नित्य।
तू छलिया कब निश्चल होगा??
यह चिंतन नित आते रहे,
स्वप्न यही भरमाते रहे...
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