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माता सरस्वती: अनादि काल से अनंत तक ज्ञान की शाश्वत यात्रा

माता सरस्वती: अनादि काल से अनंत तक ज्ञान की शाश्वत यात्रा

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय संस्कृति में ज्ञान को केवल सूचना नहीं, बल्कि 'मुक्ति' का द्वार माना गया है। इस द्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं— माँ सरस्वती। ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर आधुनिक काल के डिजिटल क्लासरूम तक, सरस्वती का अस्तित्व मानवीय चेतना के हर मोड़ पर विद्यमान है। वे केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं, बल्कि उस विवेक का प्रतीक हैं जो मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर 'देवत्व' की ओर ले जाता है। सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा जी ने जीव-जगत की रचना की, तो उन्हें चारों ओर एक मौन और जड़ता का अनुभव हुआ। सृष्टि सुंदर तो थी, पर बेजान थी—न कोई स्वर था, न कोई संगीत। पुराणों के अनुसार, इस नीरवता को तोड़ने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे चार भुजाओं वाली एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। उनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी।जैसे ही उन्होंने वीणा के तारों को झंकृत किया, सृष्टि में 'नाद' (ध्वनि) का जन्म हुआ। हवाओं में सरसराहट, नदियों में कल-कल और पक्षियों में कलरव गूंज उठा। वाणी की इस देवी को 'सरस्वती' कहा गया। वे केवल ब्रह्मा की मानस पुत्री या शक्ति नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं 'शब्द-ब्रह्म' हैं।
चार युगों में सरस्वती की साधना: सूक्ष्म से स्थूल की ओर सनातन परंपरा में समय के पहिए को चार युगों में देखा जाता है, और हर युग में सरस्वती उपासना का एक अलग आयाम रहा है:सतयुग: यह आत्मज्ञान का युग था। यहाँ सरस्वती 'सावित्री' और 'गायत्री' के रूप में केवल मंत्रों और ध्यान का विषय थीं। ऋषि-मुनि मौन रहकर अंतरमन में सरस्वती (बुद्धि) का दर्शन करते थे। त्रेतायुग: यह यज्ञों और मर्यादा का काल था। आदि कवि वाल्मीकि के मुख से निकला पहला श्लोक—"मा निषाद प्रतिष्ठां..."—सरस्वती की ही देन माना जाता है। द्वापरयुग: महाभारत और 64 कलाओं का युग। महर्षि वेदव्यास ने जब वेदों का वर्गीकरण किया और पुराणों की रचना की, तो उन्होंने सरस्वती का आह्वान किया।कलियुग: वर्तमान समय में सरस्वती उपासना का स्वरूप 'प्रतीकात्मक' और 'साकार' हो गया है। आज के सूचना और तकनीक के युग में 'डाटा' और 'इंटेलिजेंस' को भी सरस्वती का ही एक आधुनिक विस्तार माना जा सकता है।
मनीषियों की दृष्टि में सरस्वती और शिक्षा माँ सरस्वती के स्वरूप को आधुनिक भारत के दो महान विचारकों ने बड़े ही दिव्य ढंग से परिभाषित किया है: सूर्यकांत त्रिपाठी निराला , स्वामी विवेकानंद और आत्मज्ञान: विवेकानंद का मानना था कि "शिक्षा मनुष्य के भीतर पहले से ही विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है।" उनके अनुसार, सरस्वती उपासना का अर्थ है—एकाग्रता (Concentration)। उन्होंने कहा था कि यदि हमें स्वयं पर और अपनी बुद्धि पर विश्वास है, तो माँ सरस्वती की कृपा स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। वे सरस्वती को 'शक्ति' के उस रूप में देखते थे जो मनुष्य को निर्भीक और बौद्धिक रूप से स्वतंत्र बनाती है।
रवींद्रनाथ टैगोर और कलात्मक चेतना: गुरुदेव टैगोर के लिए सरस्वती केवल किताबों की देवी नहीं थीं, बल्कि वे 'सौंदर्य' और 'संगीत' की बहती धारा थीं। उन्होंने शांतिनिकेतन में शिक्षा को प्रकृति और कला के साथ जोड़ा। टैगोर का मानना था कि जब हम गीत गाते हैं या चित्र बनाते हैं, तो हम वास्तव में सरस्वती की ही आराधना कर रहे होते हैं। उन्होंने 'या कुन्देन्दु' जैसे श्लोकों की सात्विकता को अपने लेखन में स्थान दिया।
ऋग्वैदिक सरस्वती: एक लुप्त नदी का रहस्य सरस्वती का इतिहास केवल भक्ति तक सीमित नहीं है, वह भूगोल और पुरातत्व से भी जुड़ा है। वेदों में सरस्वती को 'नदीतमे' (नदियों की जननी) कहा गया है। इसरो (ISRO) की सैटेलाइट तस्वीरों ने प्रमाणित किया है कि प्राचीन भारत में एक विशाल नदी हरियाणा, राजस्थान और गुजरात से होकर बहती थी। भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण यह महान नदी लगभग 4000 वर्ष पहले विलुप्त हो गई। आज यह 'अंतःसलिला' मानी जाती है। वैश्विक क्षितिज पर सरस्वती: 'बेंज़ैतेन' से 'सुरस्वती' तक सरस्वती की महिमा भारत की भौगोलिक सीमाओं में कभी कैद नहीं रही:जापान: यहाँ इन्हें 'बेंज़ैतेन' कहा जाता है। उनके हाथ में 'बीवा' (वीणा) है और वे संगीत, ज्ञान और बहते पानी की देवी हैं। इंडोनेशिया: बाली में सरस्वती पूजा को एक महापर्व की तरह मनाया जाता है। वहाँ के लोग अपनी पांडुलिपियों और ग्रंथों को सजाकर माँ की आराधना करते हैं। स्वरूप का आध्यात्मिक अर्थ: रंगों और प्रतीकों की भाषा में श्वेत वर्ण: शुद्ध ज्ञान का प्रतीक है, जिसमें कोई मिलावट या पक्षपात नहीं होता। वीणा: राग और द्वेष के बीच संतुलन का संदेश देती है। जीवन के तार यदि बहुत ढीले हों तो स्वर नहीं निकलता, और बहुत कसे हों तो टूट जाते हैं। हंस: मनुष्य को बुराई छोड़कर अच्छाई ग्रहण करने की प्रेरणा देता है। भक्ति और सामाजिकता का संगम
बिहार के संदर्भ में सरस्वती पूजा का उल्लेख करना अनिवार्य है। यहाँ यह उत्सव एक सामाजिक आंदोलन की तरह है। हर मोहल्ले, स्कूल और नुक्कड़ पर माँ की प्रतिमा स्थापित की जाती है। छात्र अपनी कलम और दवात को माँ के चरणों में अर्पित करते हैं। हालाँकि, प्रशासन द्वारा पूजा के 'नियमन' को लेकर विवाद भी हुए हैं। नियमन का उद्देश्य सुरक्षा होना चाहिए, न कि सांस्कृतिक आस्था पर प्रहार।
आज के दौर में जब हम 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' की बात कर रहे हैं, तब माँ सरस्वती की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। ज्ञान केवल जानकारी का ढेर नहीं है; ज्ञान वह है जो हमें 'विवेक' दे। सरस्वती हमें सिखाती हैं कि शक्ति (दुर्गा) और संपत्ति (लक्ष्मी) भी बिना बुद्धि (सरस्वती) के विनाशकारी हो सकती हैं। ऋषि अगस्त्य द्वारा रचित या कुन्देन्दुतुषारहारधवला..." के स्वरों के साथ, आइए हम अपने भीतर की जड़ता और अंधकार को समाप्त करने का संकल्प लें।


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