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देह दान

देह दान


अ कीर्ति वर्द्धन
है यही तो खेल सारा, जैसे चाहे कीजिये,
प्रेम की पराकाष्ठा, मृत्यु वरण कीजिये।
क्यों जियें- क्यों मरें, कल्पना का खेल है,
जीवन को जीने, मरने का मक़सद दीजिये।
पंच तत्व की काया, पंच तत्व अंतिम मुकाम,
मृत्यु की सार्थकता, देह दान संकल्प लीजिये।
मृत्यु के उपरांत भी, अमरता का वरण करें,
धडकन बन किसी और की, हृदय हमारा जिये।
आत्मा अजर अमर, देह वस्त्र बदलती कहा है,
अपने ही नेत्रों से, आत्मा को बदलते देखिये।

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