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"मार्ग—एकांत में खुलता हुआ"

"मार्ग—एकांत में खुलता हुआ"

पंकज शर्मा
मैंने जब पहला कदम
अपने ही निर्णय के भीतर रखा,
तब रास्ता बाहर नहीं था—
वह मेरे होने की दरार में
धीरे-धीरे उग आया था।


साथ चलने की जो आकृति थी
वह वस्तुतः एक संभावना थी,
जिसे मैंने सजीव समझ लिया—
और वही मेरी पहली भूल थी।


पीछे मुड़कर देखना
दरअसल
अपने ही वर्तमान से
विश्वासघात करना है;
मैं जानता हूँ—
जो स्मृति कहलाती है
वह सत्य नहीं,
केवल मन का कंपन है।


कदमों के निशान
कुछ दूर तक
धरती पर लिखे रहते हैं,
फिर किसी कवि की पंक्ति-से
वे भीतर चले जाते हैं—
जहाँ भाषा भी
लय खोजती है।


आगे का रास्ता
किसी विधान से बंधा नहीं,
वहाँ दुःख
घटना नहीं
अवस्था बन जाता है;
पीड़ा
शब्द नहीं
स्वर बन जाती है।


मैं गिरता हूँ
और हर बार
अपनी ही चेतना में
थोड़ा और उठ जाता हूँ—
यही अस्तित्व की विडंबना है।


कभी मन कहता है—
यह मिलन
अनावश्यक था;
यह यात्रा
टाली जा सकती थी।


पर उसी क्षण
एक और स्वर उभरता है—
यदि यह सब न होता,
तो मैं
अपने होने को
किससे पहचानता?


इसलिए
अब न पछतावा है
न शिकायत—
केवल यह स्वीकार
कि अकेले तय किया गया रास्ता
ही
मेरा वास्तविक परिचय है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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